Trending

अमेरिका-चीन वार्ता: ‘प्रतिद्वंद्विता’ और ‘सहयोग’ के बीच झूलती वैश्विक व्यवस्था

बीजिंग/वॉशिंगटन (अंतरराष्ट्रीय डेस्क): जब दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं आमने-सामने होती हैं, तो पूरी दुनिया की सांसें थम जाती हैं। व्यापार युद्ध, ताइवान विवाद और दक्षिण चीन सागर में सैन्य तैनाती को लेकर जारी गहरे तनाव के बीच, अमेरिका और चीन के शीर्ष नेतृत्व ने हालिया बैठक में ‘सहयोग बनाए रखने’ की बात कही है। यह वार्ता दर्शाती है कि पूर्ण टकराव किसी के हित में नहीं है, भले ही दोनों देश एक-दूसरे को ‘अस्तित्व के खतरे’ के रूप में देखते हों।

तनाव के मुख्य केंद्र: सुरक्षा और व्यापार
अमेरिका और चीन के बीच मतभेद केवल आर्थिक नहीं, बल्कि वैचारिक और सामरिक भी हैं। अमेरिका जहां चीन के तकनीकी विस्तार (विशेषकर सेमीकंडक्टर और एआई) को रोकना चाहता है, वहीं चीन इसे अपने विकास को बाधित करने की पश्चिमी साजिश मानता है। दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती दादागिरी और ताइवान को लेकर अमेरिकी प्रतिबद्धता ने इस तनाव को ‘शीत युद्ध 2.0’ (Cold War 2.0) जैसी स्थिति में पहुँचा दिया है।

सहयोग की मजबूरी: आर्थिक अन्योन्याश्रयता
गहरे मतभेदों के बावजूद, दोनों देश एक-दूसरे से पूरी तरह ‘डी-कपल’ (संबंध विच्छेद) नहीं कर सकते। अमेरिका के लिए चीन एक विशाल बाजार और मैन्युफैक्चरिंग हब है, जबकि चीन के लिए अमेरिकी निवेश और उपभोक्ता बाजार उसकी अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा हैं। जिनेवा और बीजिंग की वार्ताओं में जलवायु परिवर्तन, एआई नैतिकता और वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा जैसे साझा मुद्दों पर सहमति बनाने की कोशिश की गई है।

भारत पर प्रभाव
अमेरिका और चीन के बीच का यह ‘बैलेंसिंग एक्ट’ भारत के लिए अवसर और चुनौती दोनों लेकर आता है। ‘चीन प्लस वन’ (China Plus One) रणनीति के तहत कई कंपनियां भारत का रुख कर रही हैं। हालांकि, यदि इन दोनों शक्तियों के बीच बड़ा सैन्य टकराव होता है, तो इसकी आंच पूरे एशिया और भारत की अर्थव्यवस्था पर भी आएगी।

अमेरिका-चीन वार्ता यह संदेश देती है कि आधुनिक दुनिया में ‘प्रतिस्पर्धा’ और ‘सह-अस्तित्व’ को साथ-साथ चलना होगा।

Related Articles

Back to top button