वैश्विक ईंधन संकट और हॉर्मुज की तपिश: क्यों पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ा रही हैं दुनिया की धड़कनें?

नई दिल्ली/दुबई (आर्थिक एवं सुरक्षा डेस्क): वैश्विक अर्थव्यवस्था एक बार फिर ‘ऊर्जा संकट’ के मुहाने पर खड़ी है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्ग, हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में बढ़ते नौसैनिक तनाव और समुद्री बारूदी सुरंगों (Sea Mines) के खतरे ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को आसमान पर पहुँचा दिया है। भारत जैसे देशों के लिए, जो अपनी तेल जरूरतों का 80% से अधिक आयात करते हैं, यह स्थिति चिंताजनक है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य का सामरिक महत्व
हॉर्मुज जलडमरूमध्य ओमान और ईरान के बीच स्थित एक संकरा समुद्री रास्ता है। दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल और एक-तिहाई एलएनजी (LNG) इसी मार्ग से होकर गुजरता है। यहाँ किसी भी प्रकार का तनाव या मार्ग का अवरुद्ध होना वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को पूरी तरह ध्वस्त कर सकता है। हाल ही में यहाँ व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा को लेकर बढ़ते विवाद ने बीमा लागत (Insurance Cost) को बढ़ा दिया है, जिसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतों पर दिख रहा है।
- प्रधानमंत्री की ‘ईंधन बचत’ की अपील के मायने
प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों से ईंधन बचाने की जो अपील की है, उसके पीछे गंभीर आर्थिक तर्क हैं। - विदेशी मुद्रा भंडार का संरक्षण: तेल की कीमतें बढ़ने से भारत का ‘चालू खाता घाटा’ (CAD) बढ़ता है।
- मुद्रास्फीति पर नियंत्रण: पेट्रोल-डीजल महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिससे खाने-पीने की वस्तुएं महंगी हो जाती हैं।
प्रधानमंत्री का यह संदेश ‘आत्मनिर्भरता’ और ‘सतर्कता’ का है, ताकि वैश्विक अस्थिरता का प्रभाव आम नागरिक की जेब पर कम से कम पड़े।
भारत की वैकल्पिक रणनीति
भारत अब केवल खाड़ी देशों पर निर्भर नहीं रहना चाहता। सरकार रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (Strategic Petroleum Reserves) को बढ़ाने और इथेनॉल सम्मिश्रण (Ethanol Blending) व इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) पर जोर दे रही है।
हॉर्मुज का संकट हमें याद दिलाता है कि ऊर्जा के क्षेत्र में ‘नवीकरणीय स्रोतों’ की ओर तेजी से बढ़ना अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है।



