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अंतरिक्ष में ‘ग्लोबल साउथ’ की बड़ी छलांग

ब्रिक्स के सहयोग से प्रिटोरिया में खुला 'अफ्रीकन स्पेस रिसर्च सेंटर', बदलेगी महाद्वीप की तस्वीर

प्रिटोरिया/नई दिल्ली (अंतरराष्ट्रीय एवं विज्ञान डेस्क): अफ्रीकी महाद्वीप को 21वीं सदी की तकनीकी क्रांति से सीधे जोड़ने और वहां की बुनियादी समस्याओं का अंतरिक्ष तकनीक से समाधान निकालने के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाया गया है। ब्रिक्स (BRICS – ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) देशों के संयुक्त सहयोग से दक्षिण अफ्रीका की राजधानी प्रिटोरिया में एक अत्याधुनिक ‘अफ्रीकन स्पेस रिसर्च सेंटर’ (African Space Research Center) का भव्य उद्घाटन किया गया है। यह अंतरिक्ष केंद्र केवल एक शोध संस्थान नहीं है, बल्कि यह पूरे अफ्रीका के लिए तकनीकी, सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण का एक नया ‘लॉन्चपैड’ है। इस महात्वाकांक्षी परियोजना का मुख्य फोकस पूरे महाद्वीप में निर्बाध ‘सैटेलाइट इंटरनेट’ (Satellite Internet) पहुंचाना और ‘कृषि निगरानी’ (Agricultural Monitoring) को हाई-टेक बनाना है।

सैटेलाइट इंटरनेट: अफ्रीका की ‘डिजिटल खाई’ को पाटने की पहल
अफ्रीका की एक बहुत बड़ी आबादी आज भी हाई-स्पीड इंटरनेट और डिजिटल कनेक्टिविटी से पूरी तरह वंचित है। भौगोलिक दुर्गमता और घने जंगलों के कारण वहां ऑप्टिकल फाइबर बिछाना बेहद खर्चीला और मुश्किल है। प्रिटोरिया का यह नया स्पेस सेंटर विशेष रूप से ‘लो अर्थ ऑर्बिट’ (LEO) सैटेलाइट्स के विकास और डेटा रिसीविंग पर काम करेगा। अंतरिक्ष में मौजूद इन ब्रिक्स उपग्रहों की मदद से अफ्रीका के सबसे दूरस्थ और कटे हुए गांवों तक सस्ती और तेज इंटरनेट सेवा पहुंचाई जा सकेगी। इससे न केवल ग्रामीण क्षेत्रों में ई-लर्निंग (ऑनलाइन शिक्षा) और टेली-मेडिसिन (दूरस्थ चिकित्सा) जैसी जरूरी सेवाएं सुलभ होंगी, बल्कि यह महाद्वीप की ‘डिजिटल अर्थव्यवस्था’ में एक बड़ा बूम (Boom) लेकर आएगा।

अंतरिक्ष तकनीक से ‘कृषि क्रांति’ और खाद्य सुरक्षा
इस स्पेस सेंटर का दूसरा और शायद सबसे महत्वपूर्ण पहलू ‘कृषि निगरानी’ है। अफ्रीकी महाद्वीप अक्सर गंभीर सूखे, टिड्डियों के हमले और जलवायु परिवर्तन की मार झेलता है, जिससे वहां भयंकर खाद्य संकट पैदा हो जाता है। अब, ब्रिक्स देशों के उन्नत ‘अर्थ-ऑब्जर्वेशन’ (Earth Observation) सैटेलाइट्स के जरिए पूरे महाद्वीप की कृषि भूमि की रियल-टाइम (Real-time) निगरानी की जाएगी। इन उपग्रहों से प्राप्त डेटा का विश्लेषण कर किसानों और स्थानीय सरकारों को मिट्टी की नमी, फसल के स्वास्थ्य, भूजल स्तर और मौसम के सटीक पूर्वानुमान की जानकारी सीधे दी जाएगी। इससे प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकेगा और पूरे अफ्रीका की ‘खाद्य सुरक्षा’ (Food Security) को एक अभेद्य कवच मिलेगा।

ब्रिक्स की एकजुटता और भारत (ISRO) की अहम भूमिका
यह मेगा-प्रोजेक्ट ब्रिक्स देशों की कूटनीतिक और तकनीकी एकजुटता का अब तक का सबसे बड़ा उदाहरण है। इसमें भारत के इसरो (ISRO), चीन के सीएनएसए (CNSA) और रूस की अंतरिक्ष एजेंसी ने अपनी अत्याधुनिक तकनीक और विशेषज्ञता को अफ्रीका के साथ साझा किया है। भारत, जिसने हमेशा से अंतरिक्ष तकनीक का उपयोग आम आदमी के फायदे के लिए किया है, उसने इस केंद्र के लिए ‘कम लागत वाले’ (Cost-effective) सैटेलाइट डेटा प्रोसेसिंग और ग्राउंड स्टेशन संचालन में अहम तकनीकी सहयोग दिया है।

पश्चिमी एकाधिकार को चुनौती
प्रिटोरिया में खुला यह ‘अफ्रीकन स्पेस रिसर्च सेंटर’ इस बात का स्पष्ट कूटनीतिक संदेश है कि ‘ग्लोबल साउथ’ (विकासशील देश) अब अंतरिक्ष तकनीक के लिए पश्चिमी देशों के मोहताज नहीं हैं। यह केंद्र अफ्रीका को एक आत्मनिर्भर महाद्वीप बनाने की दिशा में सबसे बड़ा ‘गेम चेंजर’ साबित होगा और वैश्विक अंतरिक्ष कूटनीति (Space Diplomacy) में ब्रिक्स देशों के दबदबे को और अधिक मजबूत करेगा।

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