स्वच्छ ऊर्जा में महाक्रांति
ऑस्ट्रेलिया बनाएगा दुनिया का सबसे बड़ा 'ग्रीन हाइड्रोजन' एक्सपोर्ट हब, एशियाई देशों की बुझाएगा प्यास

कैनबरा/सिडनी (इंटरनेशनल एवं एनवायरनमेंट डेस्क): जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक लड़ाई और स्वच्छ ऊर्जा (Clean Energy) की ओर दुनिया के संक्रमण (Transition) में ऑस्ट्रेलिया ने एक बेहद ऐतिहासिक और अभूतपूर्व कदम उठाया है। ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने अपने देश में दुनिया के सबसे बड़े ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ (Green Hydrogen) एक्सपोर्ट हब के निर्माण को आधिकारिक तौर पर अपनी हरी झंडी दे दी है। यह महात्वाकांक्षी मेगा-प्रोजेक्ट न केवल ऑस्ट्रेलिया की छवि को दुनिया के सामने पूरी तरह बदल देगा, बल्कि यह दक्षिण-पूर्व एशिया (South-East Asia) और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के देशों की ऊर्जा जरूरतों को भी एक नया, सुरक्षित और प्रदूषण-मुक्त विकल्प प्रदान करेगा।
क्या है ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ और यह मेगा प्रोजेक्ट?
ग्रीन हाइड्रोजन को भविष्य का ईंधन (Fuel of the Future) कहा जाता है। इसका उत्पादन सौर (Solar) और पवन (Wind) ऊर्जा जैसे पूरी तरह से नवीकरणीय स्रोतों का उपयोग करके किया जाता है। एक विशाल मशीन (इलेक्ट्रोलाइज़र) के जरिए पानी (H2O) को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़ा जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में कार्बन का उत्सर्जन ‘शून्य’ (Zero Carbon Emission) होता है। पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया (Western Australia) के विशाल, रेतीले और धूप वाले इलाकों में इस मेगा हब को स्थापित किया जा रहा है। यहां हजारों आधुनिक पवन चक्कियां और लाखों की संख्या में सोलर पैनल बिछाए जाएंगे, जिनसे पैदा होने वाली गीगावाट (Gigawatts) बिजली का उपयोग बड़े पैमाने पर इस स्वच्छ हाइड्रोजन को बनाने में किया जाएगा।
एशियाई देशों के लिए क्यों है यह संजीवनी?
इस मेगा प्रोजेक्ट का मुख्य लक्ष्य घरेलू खपत से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय निर्यात (Export) पर केंद्रित है। दक्षिण-पूर्व एशिया के कई तेजी से विकसित हो रहे देश—जैसे सिंगापुर, इंडोनेशिया, और यहां तक कि उनके पड़ोसी जापान व दक्षिण कोरिया—अपने कार्बन उत्सर्जन को कम करने (Net Zero Targets) के लिए भारी दबाव में हैं। इन देशों के पास विशाल सोलर पार्क या विंड फार्म लगाने के लिए ऑस्ट्रेलिया जितनी खाली जमीन और भौगोलिक संसाधन नहीं हैं। ऐसे में, ऑस्ट्रेलिया इस ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ को विशेष तकनीक के जरिए तरल रूप (Liquefied Hydrogen) या ‘ग्रीन अमोनिया’ (Green Ammonia) में बदलकर विशेष समुद्री जहाजों के माध्यम से इन एशियाई देशों को निर्यात करेगा। इससे इन देशों की फैक्ट्रियां और गाड़ियां बिना धुएं के चल सकेंगी।
कोयला निर्यातक से ‘रिन्यूएबल सुपरपावर’ बनने की राह
यह एक्सपोर्ट हब ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा ‘गेम चेंजर’ साबित होने वाला है। ऐतिहासिक रूप से ऑस्ट्रेलिया दुनिया भर में कोयले (Coal) और प्राकृतिक गैस (LNG) के सबसे बड़े निर्यातकों में से एक रहा है। लेकिन जीवाश्म ईंधन के खत्म होते युग को देखते हुए, ऑस्ट्रेलिया ने खुद को ‘नवीकरणीय ऊर्जा की महाशक्ति’ (Renewable Energy Superpower) के रूप में स्थापित करने का कूटनीतिक फैसला किया है। इस प्रोजेक्ट से न केवल हजारों नए ‘ग्रीन जॉब्स’ (Green Jobs) पैदा होंगे, बल्कि विदेशी निवेश (FDI) के रूप में अरबों डॉलर भी देश में आएंगे।
दुनिया के लिए एक रोल मॉडल
ऑस्ट्रेलिया का यह कदम पूरी दुनिया के लिए एक बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे कोई देश अपनी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाए बिना पर्यावरण की रक्षा कर सकता है। जैसे-जैसे यह एक्सपोर्ट हब बनकर तैयार होगा, यह वैश्विक ऊर्जा बाजार (Global Energy Market) के समीकरणों को पूरी तरह बदल कर रख देगा। यह प्रोजेक्ट साबित करता है कि भविष्य में असली ताकत उसी देश के पास होगी, जिसके पास पेट्रोल नहीं, बल्कि ‘स्वच्छ ऊर्जा’ का भंडार होगा।



