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आईटी एक्ट में ऐतिहासिक बदलाव

'डीपफेक' और फर्जी खबरों पर नकेल कसने के लिए संसद में पेश हुआ 'डिजिटल इंडिया बिल'

नई दिल्ली (टेक एवं नेशनल डेस्क): भारत के डिजिटल स्पेस को सुरक्षित, जवाबदेह और पारदर्शी बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने आज एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कदम उठाया है। देश के 26 साल पुराने ‘सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम’ (IT Act, 2000) को पूरी तरह से बदलने और आधुनिक चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार ने आज संसद के पटल पर बहुप्रतीक्षित ‘डिजिटल इंडिया बिल’ (Digital India Bill) पेश कर दिया है। इस नए और सख्त कानून का मुख्य उद्देश्य सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहे ‘डीपफेक’ (Deepfakes), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) द्वारा जनित फर्जी खबरों और बढ़ते साइबर अपराधों पर लगाम कसना है।

पुराने आईटी एक्ट की सीमाएं और नए बिल की जरूरत क्यों?
मौजूदा आईटी एक्ट साल 2000 में बनाया गया था, जब इंटरनेट अपनी शुरुआती अवस्था में था और सोशल मीडिया या ‘जेनरेटिव एआई’ जैसी तकनीकों का कोई वजूद नहीं था। हाल के वर्षों में इंटरनेट के बेतहाशा विस्तार के साथ ही डिजिटल दुनिया में एआई तकनीक का दुरुपयोग भी तेजी से बढ़ा है। विशेष रूप से चुनाव के समय राजनीतिक नेताओं के भ्रामक ‘डीपफेक’ वीडियो और आम नागरिकों, खासकर महिलाओं, की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले ‘मॉर्फ्ड’ (Morphed) वीडियो देश की कानून व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बन गए हैं। पुराना कानून इन आधुनिक और जटिल साइबर अपराधों से निपटने में नाकाफी साबित हो रहा था। इसलिए, डिजिटल नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इस नए कानून का खाका तैयार किया गया है।

‘डिजिटल इंडिया बिल’ के प्रमुख और सख्त प्रावधान
संसद में पेश किए गए इस नए बिल में एआई और डीपफेक से निपटने के लिए कई बेहद कड़े और सख्त प्रावधान किए गए हैं:

कठोर सजा और जुर्माना: नए कानून के तहत किसी व्यक्ति की छवि खराब करने, दंगे भड़काने या चुनाव को प्रभावित करने के उद्देश्य से डीपफेक या फर्जी एआई वीडियो/ऑडियो बनाने और उसे जानबूझकर शेयर करने वाले को ‘गैर-जमानती अपराध’ के दायरे में रखा गया है। इसमें भारी जुर्माने के साथ लंबी जेल की सजा का कड़ा प्रावधान है।

‘सेफ हार्बर’ (Safe Harbour) नियम में बड़ा बदलाव: अब तक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को पुराने आईटी एक्ट की ‘धारा 79’ के तहत ‘सेफ हार्बर’ की कानूनी छूट मिली हुई थी, जिसका अर्थ था कि वे थर्ड-पार्टी यूजर्स के कंटेंट के लिए जिम्मेदार नहीं थे। लेकिन नए बिल में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि ये प्लेटफॉर्म शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर डीपफेक या फर्जी खबरों को नहीं हटाते हैं, तो उनकी यह कानूनी छूट समाप्त हो जाएगी और प्लेटफॉर्म प्रबंधन पर भी आपराधिक मुकदमा चलाया जा सकेगा।

एआई कंटेंट की वाटरमार्किंग अनिवार्य: बिल में यह प्रस्ताव है कि एआई टूल बनाने वाली टेक कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म से जेनरेट होने वाले कंटेंट (वीडियो, फोटो, ऑडियो) पर एक अदृश्य ‘वाटरमार्क’ (Watermark) या स्पष्ट लेबल लगाना अनिवार्य होगा, ताकि असली और एआई जनित सामग्री के बीच आसानी से अंतर किया जा सके।

शिकायत निवारण तंत्र (Grievance Redressal): आम नागरिकों की डिजिटल शिकायतों के त्वरित समाधान के लिए एक मजबूत ‘डिजिटल अपीलीय न्यायाधिकरण’ स्थापित किया जाएगा।

लोकतंत्र और निजता की रक्षा का बड़ा कदम
संसद में इस बिल के पेश होने के बाद अब इस पर विस्तृत चर्चा होगी। तकनीकी और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह बिल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (Freedom of Speech) और डिजिटल सुरक्षा के बीच एक बेहतरीन संतुलन स्थापित करेगा। यह बिल केवल एक कानून नहीं है, बल्कि यह भारत को एक सुरक्षित और ‘भरोसेमंद’ इंटरनेट इकोसिस्टम (Trusted Internet Ecosystem) बनाने की दिशा में एक वैश्विक मानक तय करेगा। एक बात तय है कि इस बिल के कानून बनते ही सोशल मीडिया और एआई कंपनियों को भारत में काम करने के लिए अपनी जवाबदेही को कई गुना बढ़ाना होगा।

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