इतिहास के पन्नों में नया अध्याय
यूपी की गंगा घाटी में मिला 5000 साल पुराना व्यापारिक केंद्र, सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़े तार

लखनऊ/वाराणसी (आर्कियोलॉजी डेस्क): भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीन इतिहास और मानव सभ्यता के विकास को लेकर उत्तर प्रदेश से एक बेहद चौंकाने वाली और युगांतरकारी खोज सामने आई है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और इतिहास के शोधकर्ताओं की एक संयुक्त टीम ने उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र में गंगा घाटी के किनारे एक ऐसे विशाल और प्राचीन व्यापारिक केंद्र (Trade Hub) के अवशेष खोज निकाले हैं, जिसने दुनिया भर के इतिहासकारों को हैरत में डाल दिया है। शुरुआती कार्बन डेटिंग (Carbon Dating) और पुरातात्विक परीक्षणों से यह पुख्ता संकेत मिले हैं कि यह स्थल कम से कम 5000 साल पुराना है, जो इसे सीधे तौर पर विश्व की सबसे प्राचीन ‘सिंधु घाटी सभ्यता’ (Indus Valley Civilization) या हड़प्पा संस्कृति के समकालीन बनाता है।
हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसी उन्नत शहरी योजना
इस नई खोज ने पुरातत्वविदों को इसलिए सबसे ज्यादा रोमांचित किया है क्योंकि खुदाई स्थल पर मिलने वाली संरचनाएं तकनीकी और वास्तुशिल्प (Architecture) के लिहाज से बेहद उन्नत हैं। विशेषज्ञों को जमीन के नीचे पकी हुई लाल ईंटों से बने बहुमंजिला घरों के अवशेष, एक बेहद सुव्यवस्थित और ढकी हुई जल निकासी प्रणाली (Underground Drainage System), और ग्रिड पैटर्न पर बनी चौड़ी सड़कों के प्रमाण मिले हैं। यह बनावट काफी हद तक हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और लोथल जैसे प्राचीन शहरों की उन्नत ‘शहरी योजना’ (Urban Planning) से हुबहू मेल खाती है। अब तक इतिहासकार यह मानते थे कि सिंधु घाटी सभ्यता का विस्तार केवल उत्तर-पश्चिम भारत, पंजाब, गुजरात और पाकिस्तान तक ही सीमित था, लेकिन इस खोज ने साबित कर दिया है कि उस दौर की उन्नत सभ्यता का विस्तार सुदूर पूर्व में गंगा के मैदानी इलाकों (गंगा बेसिन) तक भी था।
मिले कीमती पत्थर, प्राचीन मुद्राएं और तांबे के औजार
खुदाई के दौरान यह स्पष्ट हो गया है कि यह कोई साधारण बस्ती नहीं थी, बल्कि एक बहुत बड़ा अंतरराष्ट्रीय या अंतर-क्षेत्रीय वाणिज्यिक केंद्र (Commercial Hub) था। टीम को यहां से भारी मात्रा में लाल और काले रंग के चित्रित मिट्टी के बर्तन (Painted Grey Ware), तांबे (Copper) के हथियार और कृषि उपकरण मिले हैं। सबसे महत्वपूर्ण खोज ‘अर्ध-कीमती पत्थरों’ (Semi-precious stones) जैसे कारनेलियन (Carnelian), अगेट और लैपिस लाजुली से बने खूबसूरत मनकों (Beads) की है। ये पत्थर आमतौर पर अफगानिस्तान या गुजरात से आते थे, जो यह दर्शाता है कि यहां के व्यापारियों का संपर्क हजारों किलोमीटर दूर की सभ्यताओं से था। इसके अलावा, सेलखड़ी (Steatite) से बनी कुछ ऐसी प्राचीन मुद्राएं (Seals) भी मिली हैं जिन पर हड़प्पाई लिपि जैसी ही अज्ञात लिपि में कुछ चित्र और चिह्न अंकित हैं।
इतिहास की किताबों में होगा बड़ा बदलाव
पुरातत्वविदों और इतिहासकारों के अनुसार, यह खोज इस बात का अकाट्य सबूत है कि भारत के गंगा के मैदानों में शहरीकरण (Urbanization) की प्रक्रिया बहुत पहले शुरू हो गई थी। पहले यह माना जाता था कि गंगा घाटी में बड़े शहरों का विकास महाजनपद काल (लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व) में हुआ था और उससे पहले का समय ‘अंधकार युग’ (Dark Age) था। लेकिन इस 5000 साल पुराने व्यापारिक केंद्र के मिलने से इतिहास की समयरेखा (Timeline) को फिर से लिखना पड़ेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि गंगा नदी का उपयोग उस समय ‘जलमार्ग’ (Waterway) के रूप में भारी माल ढोने और दूर-दराज के क्षेत्रों के साथ व्यापार करने के लिए किया जाता होगा।
यह ऐतिहासिक स्थल अब दुनिया भर के शोधकर्ताओं के लिए एक बेशकीमती खजाना बन गया है। राज्य सरकार और केंद्र सरकार ने इस पूरे इलाके को तत्काल प्रभाव से ‘संरक्षित क्षेत्र’ (Protected Area) घोषित कर दिया है ताकि अवशेषों को कोई नुकसान न पहुंचे। सरकार यहां एक अत्याधुनिक ऑन-साइट संग्रहालय (Museum) बनाने पर भी विचार कर रही है, जहां खुदाई में निकली इन बेशकीमती धरोहरों को आम जनता और पर्यटकों के लिए रखा जा सके। यह खोज न केवल अकादमिक जगत में एक बड़ा भूचाल लाएगी, बल्कि यह उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पर्यटन (Heritage Tourism) को भी वैश्विक मानचित्र पर एक नई और भव्य पहचान दिलाएगी।



