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लिंगायत धर्म के संस्थापक बसवेश्वर की जयंती पर पीएम मोदी ने दी श्रद्धांजलि

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने बसव जयंती के अवसर पर जगद्गुरु बसवेश्वर ( Basaveshwara) को श्रद्धांजलि अर्पित की है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि बसव जयंती के विशेष अवसर पर वे जगद्गुरु बसवेश्वर को तथा उनके अमर उपदेशों को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि बसवेश्वर का न्यायपूर्ण समाज का विजन और लोगों को सशक्त बनाने के उनके अटूट प्रयास हमें हमेशा प्रेरित करते रहेंगे। कर्नाटक में भगवान माने जाने वाले संत बसवेश्वर का जन्म 1131 ईसवी में बागेवाडी (कर्नाटक के संयुक्त बीजापुर जिले में स्थित) में हुआ था। ब्राह्मण परिवार में जन्मे बसवेश्वर के पिता का नाम मादरस और माता का नाम मादलाम्बिके था। 8 साल की उम्र में बसवेश्वर या उपनयन संस्कार (जनिवारा- पवित्र धागा) हुआ, लेकिन विद्रोही बालमन इस परंपरा में नहीं टिका और उन्होंने उस धागे को तोड़ घर त्याग दिया। बसवेश्वरा यहां से कुदालसंगम (लिंगायतों का प्रमुख तीर्थ स्थल) पहुंचे, जहां उन्होंने सर्वांगिण शिक्षा हासिल की। उन्हें बसवन्ना (Basavanna) के नाम से भी जाना जाता है।

कलचुरी साम्राज्य में मिला प्रधानमंत्री का पद :

बाद के दिनों में संत बसवेश्वर कल्याण पहुंचे जहां उस समय कलचुरी साम्राज्य के शासक बिज्जाला का शासन (1157-1167 ईसवी) था। बसवेश्वर के ज्ञान का सम्मान करते हुए कलचुरी साम्राज्य में उन्हें कर्णिका (अकाउंटेंट) का पद दिया गया। बाद में वह अपने प्रशासकीय कौशल के बदौलत राजा बिज्जाला के प्रधानमंत्री बने। लेकिन बसवेश्वर को असल चिंता समाज की बिगड़ी हुई सामाजिक-आर्थिक दशा की थी। समाज में गरीब-अमीर की खाई लगातार चौड़ी हो रही थी। छुआछूत का व्यापक असर था। लैंगिक भेदभाव वाले समाज में महिलाओं का जीवन नारकीय बना हुआ था।

सामाजिक बुराइयों को घोर विरोध :

बसवेश्वर ने इन सभी बुराइयों के खिलाफ जंग छेड़ दी। सोशलिस्ट विचारों के आरंभिक प्रणेता के रूप में बसवेश्वर के एक महान सुधारक बनकर उभरे। उनके लेखन और दर्शन ने समाज में क्रांतिकारी बदलाव की शुरुआत की। उन्होंने अपने अनुभवों को एकगद्यात्मक-पद्यात्मक शैली में ‘वचन’ ( Vachana Literature) (कन्नड़ की एक साहित्यिक विधा) के रूप में लिखा।

बसवेश्वर ने वीरशैव लिंगायत ( Veerashaiva Lingayat) समाज बनाया, जिसमें सभी धर्म के प्राणियों को लिंग धारण कर एक करने की कोशिश की। बसवेश्वर ने सबसे पहले मंदिरों में व्याप्त भ्रष्टाचार और कुरीतियों को निशाना बनाया, जहां ईश्वर के नाम पर अमीर गरीबों का शोषण कर रहे थे। उनके महत्वपूर्ण कार्यों के लिए उनके युग को ‘बसवेश्वर युग’ का नाम दिया गया। बसवेश्वर को ‘भक्तिभंडारी बसवन्न’, ‘विश्वगुरु बसवण्ण’ और ‘जगज्योति बसवण्ण’ के नाम से भी जाना जाता है। ( Anubhav Mantapa) मैग्नाकार्टा से भी पहले 12वीं सदी में भगवान बसवेश्वर का ‘अनुभव मंटवम’ अस्तित्व में आ चुका था।’

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