राष्ट्रपति मुर्मु, प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने जलियांवाला बाग के वीर शहीदों को अर्पित की श्रद्धांजलि

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने वर्ष 1919 में आज के ही दिन जलियावाला बाग में शहीद होने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि अर्पित की है। राष्ट्रपति मुर्मु ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि इस घटना ने देशवासियों में नई चेतना और स्वतंत्रता के लिए दृढ़ संकल्प का संचार किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्र हमेशा इन शहीदों के प्रति कृतज्ञ रहेगा। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि देश भक्ति की यह भावना हर एक देशवासी में राष्ट्र सेवा के प्रति समर्पण और निष्ठा का संचार करेगी।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने भी जलियांवाला बाग के वीर शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। सोशल मीडिया पोस्ट में श्री मोदी ने कहा कि उनका बलिदान जनता के अदम्य साहस का सशक्त प्रमाण है। प्रधानमंत्री ने कहा कि उनके द्वारा प्रदर्शित साहस और दृढ़ संकल्प आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता, न्याय और गरिमा के मूल्यों की रक्षा के लिए प्रेरित करता रहेगा।
गृह मंत्री अमित शाह ने सोशल मीडिया में कहा कि 1919 में इसी दिन जलियांवाला बाग में जब शांतिपूर्ण सभा में उपस्थित निहत्थे देशवासियों पर गोलियों की बौछार की गई। इस घटना से ब्रिटिश शासन का अमानवीय चेहरा उजागर हुआ। उन्होंने कहा कि इस जघन्य कृत्य ने पूरे देश को झकझोर दिया। इस घटना ने भगत सिंह और उधम सिंह जैसे क्रांतिकारियों के हृदयों में स्वतंत्रता की ज्वाला को और प्रज्वलित कर दिया। श्री शाह ने इस घटना को एक ऐतिहासिक मोड़ बताया, जिससे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में क्रांति की भावना को और अधिक गति मिली।
क्या हुआ था जलियांवाला बाग में :
रॉलेट एक्ट के तहत पंजाब में दो मशहूर नेताओं डॉक्टर सत्यपाल और डॉ. सैफुद्दीन किचलू को गिरफ्तार कर लिया गया। इनकी गिरफ्तारी के विरोध में कई प्रदर्शन हुए और कई रैलियां भी निकाली गईं। इसके बाद ब्रिटिश सरकार ने अमृतसर में मार्शल लॉ लागू कर दिया और सभी सार्वजनिक सभाओं और रैलियों पर रोक लगा दी।
13 अप्रैल, 1919 को बैशाखी के दिन, सैफुद्दीन किचलू और डॉ. सत्यपाल की गिरफ्तारी तथा रॉलेट एक्ट का विरोध करने के लिये जलियाँवाला बाग में लगभग 10,000 पुरुषों, महिलाओं और बच्चों की भीड़ जमा हुई। ब्रिगेडियर जनरल डायर ने अपने सैनिकों के साथ घटनास्थल पर पहुँचकर सभा को घेर लिया और वहाँ से बाहर जाने के एकमात्र मार्ग को अवरुद्ध कर अपने सिपाहियों को प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने का आदेश दिया।सरकारी अनुमानों के अनुसार, इस हत्याकांड में लगभग 400 लोग मारे गए और 1200 लोग घायल हुए।
जलियांवाला बाग हत्याकांड का विरोध और प्रतिक्रिया:
जलियाँवाला बाग हत्याकांड के विरोध में रवींद्रनाथ टैगोर ने नाइटहुड की उपाधि को त्याग दिया था , वहीं महात्मा गांधी ने कैसर-ए-हिंद की उपाधि वापस कर दी, जिसे बोअर युद्ध के दौरान अंग्रेज़ों द्वारा दिया गया था।
वायसराय की कार्यकारिणी परिषद के भारतीय सदस्य शंकर नायर ने इस हत्याकाण्ड के विरोध में कार्यकारिणी परिषद से इस्तीफा दे दिया। इस हत्याकांड की सब जगह निंदा हुई, परन्तु ‘ब्रिटिश हाउस ऑफ़ लाडर्स’ में जनरल डायर की प्रशंसा की गई। 14 अक्तूबर, 1919 को भारत सरकार ने जलियाँवाला बाग हत्याकांड की जाँच करने के लिए डिसऑर्डर इन्क्वायरी कमेटी (Disorders Inquiry Committee) के गठन की घोषणा की, जिसमें भारतीय सदस्य भी शामिल थे।
जलियांवाला बाग और हंटर कमीशन:
इस समिति के अध्यक्ष लॉर्ड विलियम हंटर थे, जिसके कारण इसे हंटर कमीशन भी कहा जाता है। मार्च 1920 में प्रस्तुत अंतिम रिपोर्ट में इस समिति ने सर्वसम्मति से डायर के कृत्यों की निंदा की और उसे अपने पद से इस्तीफा देने का निर्देश दिया।
भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस ने भी जलियाँवाला बाग हत्याकांड की जाँच करने के लिए अपनी गैर-आधिकारिक समिति नियुक्त की थी, जिसमें मोतीलाल नेहरू, सी. आर. दास, अब्बास तैयब जी, एम. आर. जयकर और महात्मा गांधी को शामिल किया गया था।



