महिलाओं के साथ धार्मिक भेदभाव के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने दिए महत्वपूर्ण आयाम

( विवेक ओझा ): सुप्रीम कोर्ट भारत में हर नागरिक के चाहे वो किसी भी धर्म, मजहब, जाति या लिंग का हो , के मूल अधिकारों का संरक्षक है। सुप्रीम कोर्ट गैर भेदभाव, सशक्तिकरण, लोकतंत्र की रक्षा और संविधान की सर्वोच्चता के लिए काम करता है और अब जबकि महिलाओं की धार्मिक निर्योग्यताओ के मामले पर सुप्रीम कोर्ट अंतिम सुनवाई में लगा है तो कोर्ट ने कहा है कि
अदालतें ‘धार्मिक संप्रदायों’/ संस्थानों (Religious denominations) को परिभाषित करने के लिए कठोर अमेरिकी सिद्धांतों (Rigid American doctrines) को आँख मूंदकर स्वीकार नहीं कर सकतीं। अनुच्छेद 26 कहता है कि प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय या उसके “किसी भी अनुभाग” (section) को सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अधीन अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता है।
तुषार मेहता ने इस बात पर जोर देने के लिए इसका उल्लेख किया कि संप्रदाय की कोई सख्त परिभाषा नहीं हो सकती।
उन्होंने शिरडी का उदाहरण दिया जहाँ सभी धर्मों और संप्रदायों के भक्त जाते हैं। उन्होंने तिरुपति बालाजी की ओर भी इशारा किया, जिसे अलग-अलग रूप में वैष्णव मंदिर और हिंदू मंदिर के रूप में वर्णित किया जाता है।
सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता का कहना है कि सभी धर्मों के लोग ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह या निजामुद्दीन औलिया दरगाह पर जाते हैं। ऐसे लोग एक अलग संप्रदाय बनाते हैं, भले ही वे बड़े संप्रदायों के हिस्से हों।
SG ने कहा कि अदालतें ‘धार्मिक संप्रदायों’ को परिभाषित करने के लिए कठोर अमेरिकी सिद्धांतों को आँख मूंदकर स्वीकार नहीं कर सकतीं। भारत की एक अद्वितीय धार्मिक संरचना है जो विविध है। यहाँ एक ही धर्म के भीतर भी बहुलता विद्यमान है।



