सबरीमाला मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शुरू की अंतिम सुनवाई

( विवेक ओझा): भारतीय संविधान लैंगिक आधारों पर किसी भी प्रकार के भेदभाव को रोकने की बात करता है और संविधान के अनुच्छेद 15 में स्पष्ट तौर पर इसकी चर्चा भी की गई है और इन्हीं संवैधानिक आदर्शों को मूर्तमान बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मामले में सक्रियता दिखाई है। कहते हैं कि यदि विकास को लैंगिक न्याय से नही जोड़ा गया तो विकास संकटापन्न हो ( If Development is not engendered, it will be Endangered) हो जाएगा और इसलिए अब उच्चतम न्यायालय की नौ-न्यायाधीशों की पीठ ने सबरीमाला मंदिर (Sabarimala Temple ) सहित धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और विभिन्न धर्मों द्वारा अपनाई जाने वाली धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे और सीमा से संबंधित याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई शुरू कर दी है।
उल्लेखनीय है कि सितंबर 2018 में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत के फैसले से उस प्रतिबंध को हटा दिया था, जो 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं को केरल के सबरीमाला स्थित अयप्पा मंदिर ( Ayyappa Shrine ) में प्रवेश करने से रोकता था। अदालत ने यह माना था कि यह सदियों पुरानी हिंदू धार्मिक प्रथा अवैध और असंवैधानिक थी।
हालाँकि, 2019 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली एक अन्य पाँच-न्यायाधीशों की पीठ ने विभिन्न पूजा स्थलों पर महिलाओं के खिलाफ भेदभाव के मुद्दे को एक बड़ी पीठ के पास भेज दिया था। इसी बीच, केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय को बताया है कि ‘धार्मिक संप्रदाय’ (religious denomination) क्या है या कौन सी धार्मिक प्रथाएं ‘अनिवार्य’ (essential) हैं, इसकी एक संकुचित या बंधी-बंधाई परिभाषा देना हिंदू धर्म की उस अंतर्निहित बहुलवादी प्रकृति को “संकुचित” कर देगा, जो विभिन्न संप्रदायों, समूहों, आध्यात्मिक वंशों, क्षेत्रीय परंपराओं, आस्था, प्रथाओं, अनुष्ठानों, रीति-रिवाजों और विश्वासों के माध्यम से व्यक्त होती है।



