जम्मू कश्मीर की झीलों की खराब स्थिति पर भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट में खुलासा

( विवेक ओझा): जम्मू-कश्मीर अपनी खूबसूरत झीलों और उससे दी जाने वाली पर्यटन सेवाओं के लिए जाना जाता है लेकिन इन झीलों का संरक्षण ग्लोबल वार्निंग, जलवायु परिवर्तन, बढ़ते नगरीकरण के मद्देनजर करना सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक हो जाता है। यही कारण है कि अब पर्यावरणीय मामलों में भी वित्तीय आवंटन और धन के कुशल प्रयोग की जांच , उसकी ऑडिटिंग जरूरी हो चुकी है। इसी क्रम में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ( Comptroller and Auditor General of India (CAG) की भूमिका और उनकी सक्रियता जरूरी हो जाती है ताकि लोक वित्त के एनवायरमेंटल गवर्नेंस में सही इस्तेमाल की जांच पड़ताल हो सके। हाल ही में जम्मू-कश्मीर में झीलों के तेजी से खत्म होते अस्तित्व को लेकर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की ऑडिट रिपोर्ट ने गंभीर तस्वीर पेश की है। रिपोर्ट के मुताबिक 1967 में मौजूद 697 झीलों में से 45% यानी 315 झीलें पूरी तरह गायब हो चुकी हैं, जबकि 29% यानी 203 झीलों का जल क्षेत्र सिकुड़ गया है।
2017-18 से 2021-22 के बीच की गई इस ऑडिट में सामने आया है कि कुल 518 झीलों के क्षेत्रफल में 2,851.26 हेक्टेयर की भारी कमी दर्ज की गई, जो पारिस्थितिकी तंत्र, जैव विविधता और जल संसाधनों के लिए गंभीर खतरे का संकेत है। 1,537.07 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली 315 झीलें पूरी तरह समाप्त हो चुकी हैं। इसके अलावा 203 झीलों के क्षेत्रफल में 1,314.19 हेक्टेयर की कमी दर्ज की गई है। हालांकि 150 झीलों के क्षेत्रफल में 538.22 हेक्टेयर की वृद्धि और 29 झीलों में कोई बदलाव नहीं पाया गया, लेकिन झीलों के घटते दायरे ने पर्यावरणीय संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। जिन 203 झीलों का जल क्षेत्र घटा है, उनमें से 63 झीलों का क्षेत्रफल 50 प्रतिशत या उससे अधिक कम हो चुका है, जिससे उनके पूरी तरह विलुप्त होने का खतरा बढ़ गया है।
केवल छह झीलों पर केंद्रित रहा संरक्षण :
रिपोर्ट में कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर सरकार ने केवल छह प्रमुख झीलों डल, वुलर, होकरसर, मानसबल, सुरिनसर और मानसर के लिए ही संरक्षण और प्रबंधन कार्यक्रम बनाए। शेष 691 झीलों के लिए न तो पात्रता निर्धारण किया गया और न ही पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) की योजनाओं के तहत सहायता लेने की कोई पहल की गई। 2017 से 2022 के दौरान कैपेक्स बजट का लगभग एक प्रतिशत, यानी 560.65 करोड़ रुपये, केवल इन छह झीलों पर खर्च किया गया।



