भारत रत्न डी के कर्वे की जयंती पर उनसे जुड़ी खास बातें
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व कर रहे नेताओं के सामने यह बात पूरी तरह साफ थी कि स्वाधीनता का असली मकसद तभी पूरा होगा जब समाज हर लिहाज से जागरूक होगा। जागरूकता के इस एजंडे में पहले दिन से सबसे बड़ा मुद्दा रहा महिलाओं…

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व कर रहे नेताओं के सामने यह बात पूरी तरह साफ थी कि स्वाधीनता का असली मकसद तभी पूरा होगा जब समाज हर लिहाज से जागरूक होगा। जागरूकता के इस एजंडे में पहले दिन से सबसे बड़ा मुद्दा रहा महिलाओं की स्थिति में सुधार और लैंगिक गैरबराबरी पूरी तरह समाप्त करना। समाज सुधारक धोंडो केशव कर्वे (डीके कर्वे) का नाम और कार्य इस लिहाज से ऐतिहासिक माना जाता है। उन्हें महर्षि कर्वे के नाम से भी जाना जाता है। कर्वे ने विधवा विवाह और स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई थी। 1958 में भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से उनके सौवें जन्मदिन पर सम्मानित किया था।
दिलचस्प है कि कर्वे भारत के पहले जीवित व्यक्ति थे, जिन पर भारतीय डाक विभाग ने टिकट जारी किया था। उन्हें लोग आत्मीय संबोधन के साथ ‘अन्ना कर्वे’ भी कहते थे। मराठी भाषी लोग ‘अन्ना’ शब्द का उपयोग पिता या बड़े भाई को संबोधित आदर के साथ संबोधित करने के लिए करते हैं। कर्वे का जन्म 18 अप्रैल, 1858 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के शेरावली गांव में निम्न वर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम केशवपंत और माता का नाम लक्ष्मीबाई था। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। प्रारंभिक शिक्षा के लिए उन्हें दूसरे गांव तक पैदल जाना पड़ता था। उन्होंने 1881 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मुंबई के एलफिंस्टन कॉलेज में दाखिला लिया।
यहां से उन्होंने 1884 में गणित में स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। उनका विवाह मात्र चौदह वर्ष की आयु में आठ वर्षीय राधा बाई के साथ हुआ था। 1891 में उनकी पत्नी राधा बाई का निधन हो गया था।
कर्वे स्नातक करने के बाद एलफिंस्टन स्कूल में बतौर शिक्षक पढ़ाने लगे थे। 1891 में उन्होंने पूना के प्रसिद्ध फर्ग्युसन कॉलेज में गणित विषय पढ़ाना शुरू कर दिया। क्योंकि आजादी के समय बाल गंगाधर तिलक अधिक व्यस्त रहते थे, इस कारण उन्हें वहां पढ़ाने का मौका मिला था।
उन्होंने यहां पर 1914 तक अध्यापन का कार्य किया। इस दौरान कर्वे की मुलाकात देशभक्त और समाजसेवी गोपालकृष्ण गोखले, दादा भाई नौरोजी और महादेव गोविंद रानाडे जैसे महापुरुषों से हुईं। इनसे वे इतने प्रभावित हुए कि समाज सेवा को ही उन्होंने अपने आगे के जीवन का उद्देश्य बना लिया।
1907 में कर्वे ने पूना के नजदीक हिंग्न्या गांव की एक झोपड़ी में बालिकाओं के लिए पाठशाला शुरू की। अपनी मेहनत और प्रतिभा से वे दक्कन शिक्षा समिति के आजीवन सदस्य भी बन गए थे। उन्होंने अपनी पहली पत्नी की मृत्यु के बाद 1893 में अपने मित्र की विधवा बहन गोपूबाई से शादी कर ली। कर्वे ने कई स्थानों पर विधवाओं के पुनविर्वाह भी करवाए। 1896 में उन्होंने पूना के हिंगले नामक स्थान पर दान से प्राप्त भूमि पर विधवा आश्रम और अनाथ बालिका आश्रम की स्थापना की।
1916 में कर्वे ने महिला विश्वविद्यालय की नींव रखी। कुछ ही वर्षों के बाद यह विधवाओं को समाज में आत्मनिर्भर बनाने वाला अनूठा संस्थान बन गया। अपना जीवन विधवाओं और स्त्री शिक्षा में गुजार देने वाले धोंडो केशव कर्वे का 105 वर्ष की उम्र में नौ नवंबर, 1962 को देहांत हो गया। महिला सशक्तीकरण के लिए किए गए कर्वे के कार्य ऐतिहासिक महत्व के तो हैं ही, इनकी सफलता के कारण देश में महिला स्वावलंबन का प्रेरक अध्याय भी शुुरू हुआ।
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