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चिकित्सकों से मारपीट बर्दाश्त नहीं: 'डॉक्टरों पर हमला करने वाले खुले में घूमने के लायक नहीं', सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सरिता त्रिपाठीनई दिल्ली भारत में डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों के खिलाफ हिंसा का मुद्दा हमेशा से एक बेहद संवेदनशील और राष्ट्रीय चिंता का विषय रहा है। देश की न्यायपालिका ने अब इस गंभीर मुद्दे पर एक बहुत ही सख्त और…

Ragwendra P Singh
September 8, 2026
3 min read
चिकित्सकों से मारपीट बर्दाश्त नहीं: 'डॉक्टरों पर हमला करने वाले खुले में घूमने के लायक नहीं', सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सरिता त्रिपाठी
नई दिल्ली

भारत में डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों के खिलाफ हिंसा का मुद्दा हमेशा से एक बेहद संवेदनशील और राष्ट्रीय चिंता का विषय रहा है। देश की न्यायपालिका ने अब इस गंभीर मुद्दे पर एक बहुत ही सख्त और स्पष्ट रुख अपनाया है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने चिकित्सा पेशेवरों की सुरक्षा को सर्वोपरि मानते हुए एक बेहद कड़ी टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि "जो लोग डॉक्टरों पर हमला करते हैं, वे स्वतंत्र रूप से घूमने के हकदार नहीं हैं" (Those who assault doctors don't deserve to roam free)। यह टिप्पणी उन सभी अपराधियों और असामाजिक तत्वों के लिए एक कड़ा संदेश है जो अस्पतालों में जाकर स्वास्थ्य कर्मियों के साथ अभद्रता या मारपीट करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट की यह सख्त टिप्पणी महाराष्ट्र से जुड़े एक हाई-प्रोफाइल आपराधिक मामले की सुनवाई के दौरान आई है। शीर्ष अदालत (top court) ने महाराष्ट्र सरकार की एक अपील पर नोटिस जारी किया है (issued notice on the Maharashtra government’s appeal)। यह अपील शिवसेना के पार्षद (Shiv Sena corporator) रमेश सुक्र्या म्हात्रे (Ramesh Sukrya Mhatre) को दी गई जमानत को चुनौती देने के संबंध में दायर की गई थी (challenging the bail granted to)।

यह पूरा कानूनी विवाद ठाणे (Thane) में हुई एक हिंसक घटना से संबंधित है। आरोप है कि शिवसेना पार्षद रमेश म्हात्रे इस कथित हमले से जुड़े हुए हैं (in connection with the alleged assault), जो ठाणे में तीन नगर निगम डॉक्टरों (three municipal doctors) पर किया गया था। जब राजनीतिक रसूख वाले जनप्रतिनिधि ही रक्षकों पर हमला करने लगें, तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाज़मी है। निचली अदालतों द्वारा आरोपी पार्षद को ज़मानत दिए जाने के फैसले को महाराष्ट्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी, ताकि समाज में यह संदेश न जाए कि प्रभावशाली लोग अपराध करके आसानी से बच सकते हैं।

डॉक्टरों पर होने वाले हमलों ने देश भर में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) और अन्य चिकित्सा संगठनों को कई बार हड़ताल करने पर मजबूर किया है। जब मरीज के परिजन या कोई राजनीतिक दल के कार्यकर्ता इलाज के परिणामों से असंतुष्ट होकर डॉक्टरों पर अपना गुस्सा निकालते हैं, तो इससे न केवल उस डॉक्टर का मनोबल टूटता है, बल्कि पूरे अस्पताल की आपातकालीन सेवाएं ठप हो जाती हैं, जिससे अन्य गंभीर मरीजों की जान को भी खतरा पैदा हो जाता है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा "खुले में घूमने के लायक नहीं" जैसी कड़ी भाषा का इस्तेमाल करना यह दर्शाता है कि अदालत इस मुद्दे को कितनी गंभीरता से ले रही है। यह टिप्पणी इस बात को स्थापित करती है कि समाज के रक्षकों (चिकित्सकों) पर हमला करना कोई सामान्य अपराध नहीं है, बल्कि यह पूरे स्वास्थ्य ढांचे और सभ्य समाज पर एक सीधा प्रहार है। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय आने वाले समय में डॉक्टरों की सुरक्षा को लेकर एक बड़ा कानूनी नज़ीर (Legal Precedent) बन सकता है। इसके साथ ही, यह फैसला निचली अदालतों को भी यह संदेश देगा कि वे डॉक्टरों के साथ मारपीट करने वाले आरोपियों को ज़मानत देते समय मामले की संवेदनशीलता और समाज पर पड़ने वाले इसके असर का गहराई से मूल्यांकन करें।

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