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कप्तान की विरासत: नगालैंड यूनाइटेड स्पोर्ट्स क्लब, भारतीय फुटबॉल लीग में ले जाता तालिमेरेन आओ की विरासत

30 अक्टूबर की शाम। पतझड़ के मौसम का आसमान। श्रीनगर के टीआरसी स्टेडियम में इंडियन फुटबॉल लीग के नए सीजन का आगाज होगा। मेजबान होगी रियल कश्मीर, जिसे फुटबॉल की दुनिया में ‘स्नो लेपर्ड्स’ के नाम से जाना जाता है। उसके सामने होगी एक ऐसी टीम, जो भारत के दूसरे छोर से, पहाड़ों की एक और दुनिया से निकलकर आई है। नागा पहाड़ियों की तलहटी से सफर तय कर पहुंची यह टीम अपने इतिहास का पहला राष्ट्रीय लीग मुकाबला खेलने उतरेगी।

Prakhar
October 28, 2026
12 min read
कप्तान की विरासत: नगालैंड यूनाइटेड स्पोर्ट्स क्लब, भारतीय फुटबॉल लीग में ले जाता तालिमेरेन आओ की विरासत

30 अक्टूबर की शाम। पतझड़ के मौसम का आसमान। श्रीनगर के टीआरसी स्टेडियम में इंडियन फुटबॉल लीग के नए सीजन का आगाज होगा। मेजबान होगी रियल कश्मीर, जिसे फुटबॉल की दुनिया में ‘स्नो लेपर्ड्स’ के नाम से जाना जाता है। उसके सामने होगी एक ऐसी टीम, जो भारत के दूसरे छोर से, पहाड़ों की एक और दुनिया से निकलकर आई है। नागा पहाड़ियों की तलहटी से सफर तय कर पहुंची यह टीम अपने इतिहास का पहला राष्ट्रीय लीग मुकाबला खेलने उतरेगी।

तीन साल पहले तक नगालैंड यूनाइटेड स्पोर्ट्स क्लब का कोई अस्तित्व नहीं था। लेकिन जब 2026-27 सीजन का पहला मैच शुरू होगा, तो उस पहली सीटी में इस क्लब की भी आवाज होगी। आखिर इतनी कम उम्र में कोई क्लब राष्ट्रीय लीग में सबसे पहले कदम रखने की जगह कैसे हासिल कर लेता है? इसकी कहानी जानना जरूरी है। उतना ही जरूरी यह समझना भी है कि वह अपने साथ श्रीनगर क्या लेकर जा रहा है।

जल्दबाजी में जन्मा एक क्लब

नगालैंड यूनाइटेड की स्थापना 2024 में चुमौकेदिमा में हुई थी। यह वही कस्बा है, जहां दीमापुर के आसपास की समतल जमीन खत्म होने लगती है और पहाड़ियां ऊपर उठने लगती हैं। क्लब ने अपना ध्येय वाक्य चुना—‘राइज टुगेदर’, यानी साथ मिलकर आगे बढ़ो। यह किसी नारे से ज्यादा एक साझा सफर का न्योता लगता है।

क्लब ने अपना पहला प्रतिस्पर्धी मुकाबला 28 जनवरी, 2025 को खेला। इस तारीख के पीछे एक खास वजह थी। उस शाम चुमौकेदिमा में एक नए फुटबॉल स्टेडियम का उद्घाटन हुआ। तारीख थी डॉ. तालिमेरेन आओ की 107वीं जयंती—वही नागा डॉक्टर, जिन्होंने 1948 के ओलंपिक में स्वतंत्र भारत की फुटबॉल टीम की कप्तानी की थी।

रिबन कटा, नगालैंड सुपर लीग का आगाज हुआ और नए मैदान पर उतरने वाली पहली टीम बनी नगालैंड यूनाइटेड। हालांकि, उसके पहले ही मुकाबले का नतीजा हार के रूप में आया। बाराक एफसी ने उसे 3-2 से हरा दिया।

लेकिन फुटबॉल को समझने वाले जानते हैं कि किसी टीम की कहानी का फैसला पहली हार से नहीं होता। नगालैंड यूनाइटेड ने लीग चरण में सात टीमों के बीच दूसरा स्थान हासिल किया। बारह मुकाबलों में उसके खिलाफ सिर्फ नौ गोल हुए। निसेदे पेसिये ने 27 यूनाइटेड के खिलाफ हैट्रिक लगाई और लीग के व्यक्तिगत पुरस्कारों में से एक अपने नाम किया। क्लब के कोच खोगेन सिंह को सत्र का सर्वश्रेष्ठ कोच चुना गया। प्लेऑफ समाप्त होने तक यह नया क्लब तीसरे स्थान पर था।

फिर अक्टूबर 2025 में उसने अपनी पहली ट्रॉफी जीत ली। एनएसएफ मार्टियर्स मेमोरियल ट्रॉफी का इतिहास करीब पच्चीस साल पुराना है। कोहिमा के इंदिरा गांधी स्टेडियम में खेले जाने वाले इस टूर्नामेंट में नगालैंड यूनाइटेड ने प्री-क्वार्टर फाइनल से प्रवेश किया। उसके सामने ऐसे क्लब थे, जिनकी अपनी लंबी परंपराएं और यादें थीं। लेकिन नए क्लब ने एक के बाद एक मुकाबले 7-0, 2-1 और 4-0 से जीत लिए।

18 अक्टूबर को फाइनल में उसने चेदेमा विलेज यूथ ऑर्गनाइजेशन को 3-1 से हराया। अराप कोन्याक, जोएल हाओकिप और मंटोन कोन्याक ने गोल किए। टूर्नामेंट के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी, सर्वश्रेष्ठ गोलकीपर और सर्वश्रेष्ठ डिफेंडर के पुरस्कार भी नगालैंड यूनाइटेड के हिस्से आए। खोगेन सिंह को एक बार फिर सर्वश्रेष्ठ कोच चुना गया।

जनवरी में पहली हार और अक्टूबर में पहली ट्रॉफी। यह एक ऐसा क्लब था, जो बहुत तेजी से आगे बढ़ रहा था। और उसकी इस जल्दबाजी के पीछे ठोस वजहें थीं।

विरासत का भार

इस रफ्तार को समझने के लिए उस शख्स के पास लौटना होगा, जिसकी जयंती पर स्टेडियम का उद्घाटन हुआ था। करीब सौ साल पहले, नागा पहाड़ियों के इम्पुर में मिशन के मैदान पर कुछ नंगे पैर लड़के फुटबॉल खेला करते थे।

उनके पास गेंद के नाम पर जो मिल जाता, उसी से काम चलाते। कभी कपड़ों की गांठ से बनी गेंद, कभी बेंत से बुना गोला, तो कभी भारी, मोटे छिलके वाला चकोतरा—जिसे पैर से मारने पर उंगलियों में चोट लग जाती और जो अपनी मनमर्जी से कहीं भी उछल जाता।

उन लड़कों में एक तालिमेरेन आओ भी थे। उनके पिता, नागा पहाड़ियों के पहले रेवरेंड, की मृत्यु टाइफाइड से हो गई थी। उस समय आओ किशोरावस्था की दहलीज भी पार नहीं कर पाए थे। पिता की आखिरी इच्छा थी कि उनका बेटा डॉक्टर बने और नागा समुदाय की सेवा करे।

आओ ने पिता की यह इच्छा पूरी की। लेकिन इस सफर में उन्होंने एक और मुकाम हासिल किया—वे भारत की फुटबॉल टीम के कप्तान बने।

31 जुलाई, 1948 को पूर्वी लंदन के इलफोर्ड स्थित क्रिकलफील्ड स्टेडियम में आओ स्वतंत्र भारत की ओर से पहले ओलंपिक फुटबॉल मुकाबले में टीम की अगुआई कर रहे थे। सामने फ्रांस की टीम थी। उनके आठ साथी बिना जूतों के खेले। पैरों में मोटे मोजे और पट्टियां बांधकर उन्होंने मैदान पर उतरने का फैसला किया था।

भारत ने दो पेनल्टी गंवाईं और आखिरी मिनट से कुछ पहले हुए गोल के कारण मुकाबला हार गया। मैच के बाद एक पत्रकार ने कप्तान से पूछा कि भारतीय खिलाड़ी नंगे पैर क्यों खेलते हैं। आओ का जवाब ऐसा था, जो भारतीय फुटबॉल के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हो गया—

“हम भारत में फुटबॉल खेलते हैं, जबकि आप बूटबॉल खेलते हैं।” इसके बाद वे पहाड़ियों में लौट आए। उन्होंने चिकित्सा के क्षेत्र में काम किया और नगालैंड के पहले स्वास्थ्य सेवा निदेशक बने। लेकिन फुटबॉल के प्रति उनका प्रेम कभी कम नहीं हुआ।

आज भी नगालैंड के लगभग हर गांव में अपना फुटबॉल मैदान है। कोच किविलु किबा का मानना है कि राज्य में कई जगहों पर कुछ किलोमीटर चलते ही एक और मैदान मिल जाएगा।

किबा कहते हैं, “नगालैंड में फुटबॉल सिर्फ एक खेल नहीं है।” इस गर्मी में उंगमा गांव के युवाओं ने राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे बांस से करीब पंद्रह फुट ऊंची विश्व कप ट्रॉफी बना डाली। उसमें लोहे का एक भी सहारा इस्तेमाल नहीं हुआ। हालांकि, ऊपर लगे ग्लोब को सही आकार देने में उन्हें दो बार नाकामी मिली। आखिरकार गांव के बुजुर्ग आगे आए और उन्होंने युवाओं को बताया कि इसे ठीक तरह से कैसे बनाया जाए।

फुटबॉल के प्रति यह लगाव आज भी यहां की जिंदगी में रचा-बसा है। लेकिन तालिमेरेन आओ की विरासत का एक पहलू ऐसा भी था, जो कम दिखाई देता था और कहीं ज्यादा गहरा था।

जिस राज्य ने भारतीय फुटबॉल को उसका पहला कप्तान दिया, वहां 78 साल तक किसी क्लब को राष्ट्रीय लीग में खेलने का अवसर नहीं मिला। नगालैंड यूनाइटेड ने 2024 में इसी विरासत की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली। और यही वह वजह थी, जिसने उसके लिए इंतजार को एक विकल्प नहीं रहने दिया।

एक मशाल, जो आगे बढ़ाई गई

राष्ट्रीय लीग तक पहुंचने का पारंपरिक रास्ता खुला था। निचली डिवीजनों में खेलते रहो, हर सीजन थोड़ा ऊपर चढ़ो और फिर किसी दिन मंजिल तक पहुंचने की उम्मीद करो।

क्लब के बोर्ड के सदस्य अबू मेथा कहते हैं, “उस रास्ते से पहुंचने में हमें कई साल लग जाते। और हमारे पास इतना समय नहीं था।”

एक छोटा रास्ता था। वह रास्ता पड़ोसी राज्य से होकर गुजरता था। आइजोल एफसी जानता है कि उम्मीदों को कैसे झुठलाया जाता है। 2017 में मिजोरम की पहाड़ियों से निकला यह क्लब पिछले सीजन में लगभग रेलिगेशन का सामना कर चुका था। फिर आखिरी दिन उसे शिलांग में जाकर सिर्फ एक अंक की जरूरत थी। शिलांग लाजोंग के खिलाफ 1-1 से ड्रॉ खेलकर उसने इतिहास रच दिया। आइजोल राष्ट्रीय लीग जीतने वाला पूर्वोत्तर का पहला क्लब बन गया।

इस उपलब्धि को भारतीय फुटबॉल का ‘लीस्टर सिटी वाला पल’ कहा गया। इंग्लैंड में लीस्टर सिटी ने जिस तरह तमाम दिग्गजों को पीछे छोड़कर प्रीमियर लीग का खिताब जीता था, कुछ वैसा ही कमाल आइजोल ने भारतीय फुटबॉल में कर दिखाया था।

उस ऐतिहासिक टीम के सहायक कोच एक नागा थे—विलियम कोसो, जो एएफसी ‘ए’ लाइसेंस हासिल करने वाले नगालैंड के पहले कोच बने थे।

 इस साल जून में आइजोल एफसी ‘फुटबॉल फॉर पीस’ अभियान के तहत नगालैंड पहुंचा। 6 जून को चुमौकेदिमा में नगालैंड यूनाइटेड के खिलाफ एक मुकाबला खेला गया, जिसे नाम दिया गया—‘मैच फॉर पीस, गोल फॉर होप’। टिकट की कीमत सिर्फ बीस रुपये रखी गई थी और इससे जुटाई गई रकम एक अनाथालय को दी जानी थी।

आइजोल ने मुकाबला 2-0 से जीता। लेकिन उस दिन मैदान पर सिर्फ गोल और नतीजा ही मायने नहीं रखते थे। आइजोल के मालिक रॉबर्ट आर. रॉयते ने उस भावना को शब्द दिए, जिसे वहां मौजूद लोग पहले से महसूस कर रहे थे। उन्होंने कहा कि नगालैंड भी राष्ट्रीय लीग में एक क्लब का हकदार है।

तीन महीने बाद, 9 सितंबर को, अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (एआईएफएफ) ने दोनों क्लबों के बीच हुए सद्भावना समझौते को मंजूरी दे दी।

इसके तहत नगालैंड यूनाइटेड ने इंडियन फुटबॉल लीग में आइजोल की जगह ले ली। आइजोल ने बदले में उसे तकनीकी सहयोग और खिलाड़ियों के विकास में मदद देने का वादा किया। राष्ट्रीय लीग में लगातार ग्यारह सीजन बिताने और कभी रेलिगेशन का सामना न करने वाला आइजोल अब मिजोरम प्रीमियर लीग में खेलेगा।

फुटबॉल की दुनिया में चीजें आसानी से किसी को नहीं मिलतीं। लेकिन इस बार पहाड़ियों के एक क्लब ने दूसरे क्लब के हाथों में मशाल थमा दी। और लीग के कार्यक्रम में भी इस कहानी की खूबसूरती नजर आती है। 25 नवंबर को नगालैंड यूनाइटेड शिलांग में खेलेगा—उसी शहर में, जहां आइजोल ने अपना ऐतिहासिक खिताब जीता था।

फिर 7 दिसंबर को उसका सामना आइजोल में होगा। एक सफर यहां खत्म नहीं होता, बल्कि दूसरे के लिए रास्ता खोलता है।

 समय के खिलाफ एक टीम का निर्माण

इसके बाद असली काम शुरू हुआ। और इस बार घड़ी तेजी से चल रही थी। क्लब ने कोचों और सहयोगी स्टाफ की नियुक्ति के लिए आवेदन मांगे। सैकड़ों आवेदन पहुंचे।

कुछ अर्जेंटीना, स्पेन और ब्राजील जैसे देशों से भी आए। राष्ट्रीय लीग में खेलने का अनुभव रखने वाली टीम और स्टाफ का एक ढांचा उसे विरासत में मिला था। फिर भी बोर्ड ने शुरुआत से ही एक सिद्धांत स्पष्ट कर दिया—नगालैंड के स्थानीय खिलाड़ियों को प्राथमिकता दी जाएगी।

इस फैसले का एक छोटा-सा, लेकिन अहम उदाहरण 17 अक्टूबर को चुमौकेदिमा में देखने को मिला। एक स्थानीय कार डीलरशिप ने दो युवा खिलाड़ियों के सम्मान में एक छोटा समारोह आयोजित किया।

घुके चिशी, 20 वर्षीय केंद्रीय मिडफील्डर, और विनातो आचुमी—दोनों नगालैंड की अंडर-20 टीमों से आगे बढ़े थे। अब दोनों को इंडियन फुटबॉल लीग में नगालैंड यूनाइटेड की ओर से खेलने के लिए चुना गया था।

यह कोई बड़ा आयोजन नहीं था। न बड़े मंच थे, न भव्य समारोह। बस एक कस्बे का अपने दो लड़कों को सम्मान देने का छोटा-सा अवसर था, जो अब एक बड़े सफर पर निकलने वाले थे।

क्लब के समन्वयक जेंटलसन वाशुम ने इसी मौके पर आगे की योजनाओं की रूपरेखा रखी। लीग में बीस मुकाबले होंगे—दस घरेलू मैदान पर और दस बाहर। चुमौकेदिमा में फीफा से मान्यता प्राप्त कृत्रिम टर्फ बिछाई जानी है। और क्लब चाहता है कि वह नगालैंड की ऐसी पहचान बने, जिस पर देश ही नहीं, दुनिया की भी नजर पड़े।

 मेथा अपनी महत्वाकांक्षाओं को लेकर कोई संकोच नहीं रखते। वे कहते हैं, “जब भी आप किसी मैदान में उतरते हैं, तो जीतने के लिए उतरते हैं।” नगालैंड फुटबॉल एसोसिएशन के अध्यक्ष के. नेइबू सेखोस इस पल को ऐतिहासिक बताते हैं। लेकिन साथ ही वे यह भी जोड़ते हैं कि नगालैंड ने अभी तो बस शुरुआत की है।

 आगे का रास्ता

श्रीनगर के बाद का कार्यक्रम अपने आप में एक कहानी कहता है। 14 नवंबर को नगालैंड यूनाइटेड राष्ट्रीय लीग में अपना पहला घरेलू मुकाबला खेलेगा। सामने होगी गोकुलम केरल की टीम। मैदान वही चुमौकेदिमा होगा, जहां क्लब ने अपने पहले ही मुकाबले में हार का सामना किया था।

दो सप्ताह बाद गोवा का पुराना और प्रतिष्ठित क्लब डेम्पो वहां पहुंचेगा। फिर 19 दिसंबर को कोलकाता से मोहम्मडन स्पोर्टिंग आएगी। वही कोलकाता, जहां तालिमेरेन आओ ने कभी मोहन बागान की कप्तानी की थी।

यह सोचना दिलचस्प है कि मोहन बागान के उस पुराने कप्तान को कैसा लगता, अगर वे अपने लोगों के क्लब को कोलकाता के इस ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ खेलते देखते।

इंडियन फुटबॉल लीग का दर्शक वर्ग तेजी से बढ़ा है। पिछले सीजन में टीवी पर लीग देखने वालों की संख्या उससे पिछले सीजन के मुकाबले चार गुना हो गई थी। इस बार लीग एक बार फिर पूरे होम-एंड-अवे प्रारूप में लौट रही है। यानी लगभग हर दूसरे सप्ताह राष्ट्रीय लीग का फुटबॉल नागा पहाड़ियों के साये में खेला जाएगा।

क्लब ने दर्शकों से एक खास अपील भी की है। वह चाहता है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले नागा लोग, खासकर छात्र, जहां भी उसकी टीम खेले, वहां पहुंचें और स्टेडियम के उस हिस्से को भर दें, जहां मेहमान टीम के समर्थक बैठते हैं।

 जरा उस दृश्य की कल्पना कीजिए। श्रीनगर की सर्द रात। पहाड़ियों से आए कुछ युवा, अपने सूटकेस से निकाले गए स्कार्फ गले में लपेटे हुए। सामने मैदान में उनकी टीम खेल रही है—वही टीम, जो पिछले सीजन तक अपने राज्य की लीग में मुकाबले खेलती थी।

 उनके लिए यह सिर्फ एक फुटबॉल मैच नहीं होगा। यह घर से दूर घर की मौजूदगी का एहसास होगा।

 इस बार पहला कदम नगालैंड का है

30 अक्टूबर की शाम नगालैंड के अलग-अलग हिस्सों में लोग स्क्रीन के सामने जुटेंगे। कहीं सामुदायिक भवनों में, कहीं घरों के कमरों में, तो कहीं उन दुकानों में, जिनके शटर आधे गिरे होंगे।

 गांवों के बाहर मैदानों में बच्चे अंधेरा होने तक गेंद के पीछे भागते रहेंगे। फिर कोई उन्हें घर लौटने के लिए आवाज देगा। उनके पीछे पहाड़ियां शाम की नीली चादर में ढलने लगेंगी, ठीक वैसे ही जैसे हमेशा से होता आया है।

 करीब सौ साल पहले, एक नागा लड़का मिशन के मैदान में चकोतरे के पीछे दौड़ता था। उसके पास गेंद नहीं थी, इसलिए वह जो मिला उसी को किक मारता था। और उस खेल को कहीं ले जाने वाला कोई रास्ता भी दिखाई नहीं देता था।

 लेकिन जब उस खेल ने आखिरकार उसे कहीं पहुंचाया, तो रास्ता घर से दूर जाता था—गुवाहाटी, कोलकाता और फिर लंदन तक।

 आज उन्हीं मैदानों में खेलने वाले बच्चों के सामने एक रास्ता ऐसा भी है, जो दूसरी दिशा में जाता है। पहाड़ियों से उतरकर चुमौकेदिमा तक। उस स्टेडियम तक, जिसका उद्घाटन तालिमेरेन आओ की जयंती पर हुआ था। और उस क्लब तक, जो अब नगालैंड के नाम पर इंडियन फुटबॉल लीग में खेलेगा।

 30 अक्टूबर को शुरू होने वाला यह सीजन सिर्फ एक नए क्लब का पहला सीजन नहीं है। यह उन तमाम बच्चों की उम्मीदों का भी आगाज है, जो आज अपने गांव के मैदानों में गेंद के पीछे भाग रहे हैं।

 राष्ट्रीय लीग में जगह पाने के लिए नगालैंड ने 78 साल इंतजार किया। अब बारी उसकी है सबसे पहले कदम बढ़ाने की।

 

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