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महिला सुरक्षा और कानूनी सुधारों पर संसदीय समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपी

अभिषेक सिंह/ नई दिल्ली: देश में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों और मौजूदा कानूनों की कमियों को दूर करने के लिए गठित एक उच्च-स्तरीय संसदीय समिति ने अपनी बहुप्रतीक्षित अंतिम रिपोर्ट मंगलवार को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दी है। इस रिपोर्ट में आपराधिक न्याय प्रणाली (Criminal Justice System) में बड़े और व्यापक बदलावों की सिफारिश की गई है, ताकि महिलाओं को त्वरित और पारदर्शी न्याय मिल सके। इस समिति ने देश भर के न्यायविदों, पुलिस अधिकारियों, गैर-सरकारी संगठनों और समाजशास्त्रियों के साथ कई दौर की गहन चर्चा के बाद यह विस्तृत मसौदा तैयार किया है।

फास्ट-ट्रैक अदालतों और समय-सीमा पर जोर

समिति की सबसे प्रमुख सिफारिश न्याय मिलने में होने वाली देरी को खत्म करने से जुड़ी है। रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि बलात्कार और पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत आने वाले गंभीर मामलों की सुनवाई के लिए देश के हर जिले में विशेष ‘फास्ट-ट्रैक अदालतों’ की संख्या दोगुनी की जाए। इसके साथ ही, ऐसे मामलों में चार्जशीट दायर करने से लेकर अंतिम फैसले तक की पूरी कानूनी प्रक्रिया को अधिकतम छह महीने के भीतर पूरा करने की अनिवार्य वैधानिक समय-सीमा (Statutory Timeline) तय करने की वकालत की गई है।

साइबर क्राइम और ‘डीपफेक’ पर सख्त कानून की मांग

समिति ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की है कि डिजिटल युग में महिलाओं के खिलाफ अपराधों का स्वरूप बदल गया है। रिपोर्ट में विशेष रूप से ‘डीपफेक’ (Deepfake) तकनीक, मॉर्फ्ड वीडियो और ऑनलाइन उत्पीड़न (Cyber Stalking) से निपटने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act) में संशोधन की सिफारिश की गई है। समिति का मानना है कि महिलाओं के खिलाफ ऑनलाइन ब्लैकमेलिंग और साइबर बुलिंग को गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में डाला जाना चाहिए और इसमें सजा के प्रावधानों को और सख्त किया जाना चाहिए।

पुलिस संवेदनशीलता और जवाबदेही

रिपोर्ट में पुलिस के रवैये को लेकर भी अहम टिप्पणियां की गई हैं। कई मामलों में यह देखा गया है कि थानों में पीड़िताओं की एफआईआर (FIR) दर्ज करने में आनाकानी की जाती है। समिति ने सुझाव दिया है कि अगर कोई भी पुलिस अधिकारी महिलाओं से जुड़े संज्ञेय अपराधों में एफआईआर दर्ज करने में कोताही बरतता है, तो उसके खिलाफ तुरंत विभागीय कार्रवाई के साथ-साथ आपराधिक मामला भी दर्ज किया जाए। इसके अलावा, हर थाने में ‘महिला हेल्प डेस्क’ को अनिवार्य रूप से 24×7 सक्रिय रखने का भी निर्देश दिया गया है।

कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि सरकार संसद के आगामी सत्र में इस रिपोर्ट की सिफारिशों को कानून का रूप देती है, तो यह देश में महिला सशक्तिकरण और सुरक्षा की दिशा में एक ‘गेम-चेंजर’ साबित होगा।

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