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‘स्मार्ट पुलिसिंग’ का नया युग: अमित शाह का 3 साल का अल्टीमेटम, जांच एजेंसियों के लिए अनिवार्य हुआ AI का इस्तेमाल

राघवेंद्र प्रताप सिंह/ नई दिल्ली: भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली (Criminal Justice System) में सालों से चले आ रहे मुकदमों के बोझ और जांच की धीमी गति को खत्म करने के लिए मोदी सरकार ने अब तक का सबसे आक्रामक और आधुनिक कदम उठाया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने आज एक बेहद महत्वपूर्ण घोषणा करते हुए देश की सभी केंद्रीय जांच एजेंसियों (जैसे CBI, NIA, ED) और राज्य पुलिस बलों के लिए एक स्पष्ट ‘डेडलाइन’ तय कर दी है।

गृह मंत्री ने जांच और न्याय प्रक्रिया को तेज, पारदर्शी और त्रुटिहीन बनाने के लिए 3 साल का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके साथ ही सबसे बड़ा फैसला यह लिया गया है कि अब सभी बड़ी जांच एजेंसियों के लिए ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (AI) और ‘मशीन लर्निंग’ (ML) का उपयोग करना पूरी तरह से अनिवार्य होगा।

3 साल का लक्ष्य: क्या है गृह मंत्रालय का मास्टरप्लान?
गृह मंत्री अमित शाह का यह नया विज़न सीधे तौर पर हाल ही में लागू हुए तीन नए आपराधिक कानूनों (भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम) की भावना से जुड़ा हुआ है। 3 साल के इस लक्ष्य के पीछे मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं:

पेंडेंसी खत्म करना: आज देश की विभिन्न अदालतों और थानों में करोड़ों मामले लंबित (Pending) हैं। गृह मंत्रालय का लक्ष्य है कि आने वाले 3 सालों में मुकदमों के निपटारे (Disposal Rate) को ऐतिहासिक स्तर पर ले जाया जाए।

दोषसिद्धि दर (Conviction Rate) बढ़ाना: भारत में अक्सर कमजोर सबूतों और खराब चार्जशीट के कारण अपराधी छूट जाते हैं। नया लक्ष्य देश भर में दोषसिद्धि दर को 90% से ऊपर ले जाना है।

त्वरित न्याय: किसी भी गंभीर आपराधिक मामले (जैसे हत्या, आतंकवाद या बड़ा साइबर फ्रॉड) की एफआईआर (FIR) से लेकर कोर्ट के अंतिम फैसले तक की पूरी प्रक्रिया को एक तय समय सीमा के भीतर बांधना।

AI बनेगी जांच की रीढ़: कैसे काम करेगी नई तकनीक?
इस पूरे मिशन में सबसे बड़ा ‘गेम चेंजर’ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का अनिवार्य उपयोग होगा। गृह मंत्री ने स्पष्ट किया है कि 21वीं सदी के अपराधों—विशेषकर साइबर अपराध, टेरर फंडिंग और डीपफेक—से निपटने के लिए केवल पारंपरिक ‘डंडा पुलिसिंग’ काफी नहीं है। अब पुलिस को अपराधियों से दो कदम आगे रहने के लिए डेटा और तकनीक का सहारा लेना ही होगा।

जांच में AI का उपयोग इस प्रकार किया जाएगा:

क्राइम पैटर्न एनालिसिस: एआई सिस्टम मिनटों में हजारों पुराने केस डायरी और एफआईआर का विश्लेषण करके अपराधियों के काम करने के तरीके (Modus Operandi) और उनके नेटवर्क को डिकोड कर सकेगा।

सीसीटीवी और फेशियल रिकग्निशन: भीड़भाड़ वाले इलाकों में लगे हजारों कैमरों की फुटेज को मैनुअली देखने के बजाय, AI-आधारित फेशियल रिकग्निशन तकनीक संदिग्धों को सेकंडों में पहचान लेगी।

वॉयस एनालिसिस और डीपफेक डिटेक्शन: आज के साइबर अपराधी आवाज़ बदलकर या डीपफेक वीडियो के जरिए ठगी और दंगे भड़काते हैं। AI टूल्स इन फर्जी वीडियो और ऑडियो की तुरंत पहचान कर लेंगे।

इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य का एकत्रीकरण: मोबाइल और लैपटॉप से डिलीट किए गए डेटा (क्रिप्टो वॉलेट्स, डार्क वेब चैट्स) को रिकवर करने और उसे कोर्ट में मान्य सबूत के तौर पर पेश करने में एआई सॉफ्टवेयर अहम भूमिका निभाएंगे।

‘डेटा’ से ‘जस्टिस’ तक का सफर
गृह मंत्री अमित शाह का यह फैसला भारत की आंतरिक सुरक्षा और न्याय प्रणाली में एक ‘पैराडाइम शिफ्ट’ (Paradigm Shift) है। अब तक पुलिस की जांच मुख्य रूप से गवाहों के बयानों पर निर्भर करती थी, जो अक्सर मुकर (Hostile) जाते थे। लेकिन डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक सबूत कभी झूठ नहीं बोलते।

जांच एजेंसियों में एआई का अनिवार्य उपयोग इस बात की गारंटी देगा कि किसी निर्दोष को फंसाया न जा सके और कोई शातिर अपराधी पुलिस की फाइलों की खामी का फायदा उठाकर बच न सके। हालांकि, इस ‘स्मार्ट पुलिसिंग’ की सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि देश भर के पुलिस थानों (विशेषकर टियर-2 और टियर-3 शहरों में) के कांस्टेबल और जांच अधिकारी (IO) इस नई तकनीक को कितनी जल्दी अपनाते हैं और इसके लिए उनका कितना सघन प्रशिक्षण (Training) किया जाता है।

अमित शाह का यह 3 साल का अल्टीमेटम केवल एक विभागीय लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह आम नागरिक को यह भरोसा दिलाने का प्रयास है कि ‘न्यू इंडिया’ में न्याय न केवल मिलेगा, बल्कि समय पर और पूरी पारदर्शिता के साथ मिलेगा।

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