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अनिवार्य मतदान पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

वोट न देने पर सजा की मांग वाली याचिका खारिज

भारत जैसे दुनिया के सबसे बड़े और जीवंत लोकतंत्र में मतदान के प्रतिशत को बढ़ाने को लेकर अक्सर चिंताएं और बहसें होती रहती हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में, ‘द टेलीग्राफ ऑनलाइन’ (The Telegraph Online) की 16 अप्रैल 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने एक बेहद अहम और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने गुरुवार को उस जनहित याचिका (PIL) पर विचार करने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया, जिसमें देश भर में मतदान को अनिवार्य बनाने और वोट न देने वाले नागरिकों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने की मांग की गई थी।

क्या थी याचिकाकर्ता की मांग?
यह जनहित याचिका लोकतंत्र के एक बहुत ही बुनियादी लेकिन जटिल पहलू को छूती थी। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई थी कि वह भारत सरकार या चुनाव आयोग को यह निर्देश दे कि देश में मतदान को कानूनी रूप से अनिवार्य (Compulsory Voting) कर दिया जाए। सबसे बड़ी और विवादास्पद मांग यह थी कि जो भी पात्र मतदाता बिना किसी ठोस या वैध कारण के अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं करता है, उसके इस कृत्य को दंडनीय अपराध (Punishable offence) माना जाए और इसके लिए सजा का प्रावधान हो। याचिकाकर्ता का तर्क रहा होगा कि इससे शत-प्रतिशत मतदान सुनिश्चित होगा और लोकतंत्र अधिक मजबूत बनेगा।

सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट तर्क और फैसला:
इस गंभीर मसले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में एक बहुत ही स्पष्ट और संवैधानिक रेखा खींची। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश में मतदान को अनिवार्य बनाना या न बनाना पूरी तरह से सरकार के “नीतिगत अधिकार क्षेत्र” (Policy Domain) का हिस्सा है।

न्यायपालिका का काम कानूनों की व्याख्या करना है, न कि नीतियां बनाना। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्यायपालिका अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर विधायिका (संसद) या कार्यपालिका (सरकार) को ऐसे नीतिगत फैसले लेने या कानून बनाने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। इस तरह के ‘जनादेश’ या दिशा-निर्देश अदालत द्वारा जारी नहीं किए जा सकते।

इस फैसले के मायने और लोकतांत्रिक प्रभाव:
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कई मायनों में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
1. शक्तियों का पृथक्करण: यह फैसला भारतीय संविधान में निहित ‘शक्तियों के पृथक्करण’ (Separation of Powers) के सिद्धांत को मजबूत करता है। यह याद दिलाता है कि कानून बनाने का विशेषाधिकार केवल चुनी हुई संसद के पास है।
2. व्यावहारिक चुनौतियाँ: भारत जैसे 140 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश में अनिवार्य मतदान लागू करना व्यावहारिक रूप से असंभव है। लाखों लोग रोजगार, बीमारी या अन्य मजबूरियों के कारण अपने गृह राज्य से दूर रहते हैं। ऐसे में वोट न देने पर करोड़ों लोगों को सजा देना न्यायसंगत नहीं हो सकता।
3. अधिकार बनाम बाध्यता: कई कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि संविधान द्वारा दिए गए ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के अधिकार में ‘चुप रहने’ या ‘वोट न देने का अधिकार’ भी शामिल है। मतदान एक नागरिक का अधिकार और नैतिक कर्तव्य है, इसे पुलिसिया डंडे या सजा के डर से थोपी गई कानूनी बाध्यता नहीं बनाया जा सकता।

संक्षेप में कहा जाए तो, सुप्रीम कोर्ट का यह ताजा और दो-टूक फैसला यह संदेश देता है कि लोकतंत्र में भागीदारी जागरूकता और स्वेच्छा से आनी चाहिए, न कि दंड के भय से। अदालत ने यह साफ कर दिया है कि यदि देश को अनिवार्य मतदान की दिशा में जाना है, तो इसका रास्ता संसद के सदनों और जनता की सहमति से होकर गुजरेगा, न कि अदालती आदेशों से। इस फैसले ने भारत में अनिवार्य मतदान की चल रही बहस पर फिलहाल के लिए एक मजबूत कानूनी पूर्णविराम लगा दिया है।

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