जानिए सबरीमाला केस की अंतिम सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार ने अब तक क्या क्या कहा

( विवेक ओझा): केरल के शबरीमाला के लॉर्ड अयप्पा मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट इस समय इस प्रकरण पर अंतिम सुनवाई करते हुए अपने निर्णय, आंकलन, तर्क, निर्देश प्रस्तुत कर रही है। आइए जानते हैं कि आज 7 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सुनवाई में अब तक क्या क्या कहा..
सबरीमाला के फैसले ने अंतरधार्मिक विविधता पर प्रहार किया :
केंद्र ने अपने लिखित प्रतिवेदन में कहा कि शबरीमाला टेंपल में महिलाओं के प्रवेश के इजाजत से जुड़े 2018 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के प्रतिबंधात्मक दृष्टिकोण ने ‘अंतःधार्मिक विविधता’ (intrareligious diversity) पर प्रहार किया। केंद्र का तर्क है कि 2018 के फैसले ने, जिसने रजस्वला आयु की महिलाओं को सबरीमाला के अयप्पा मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी थी, हिंदू धर्म की बहुलता और विविधता को संकुचित कर दिया है। आस्था, विश्वास, सिद्धांत, प्रथा और आध्यात्मिक जीवन के तरीके एक समुदाय से दूसरे समुदाय में भिन्न होते हैं, चाहे वे कितने भी सूक्ष्म क्यों न हों। हिंदू धर्म के संदर्भ में यह अधिक स्पष्ट है, जो किसी एक संस्थापक, ग्रंथ, शास्त्र या अनिवार्य प्रथाओं के समूह पर आधारित नहीं है। हिंदू धर्म अपने चरित्र से ही परंपराओं, विचारधाराओं, रीति-रिवाजों और पूजा के रूपों की व्यापक बहुलता को अपने भीतर समेटे हुए है। श्री मेहता ने कहा, “हिंदू धर्म को एक संकीर्ण या एकल परिभाषा में समेटने का कोई भी प्रयास सैद्धांतिक रूप से त्रुटिपूर्ण और संवैधानिक रूप से असुरक्षित होगा।”
केंद्र सरकार की तरफ से भारत के सॉलिसिटर जनरल का कहना था कि भारत ने महिलाओं के साथ हमेशा न केवल बराबरी का, बल्कि उन्हें उच्च स्तर पर रखकर व्यवहार किया है। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि भारत ने हमेशा महिलाओं को उच्च स्थान दिया है। हम विशिष्ट रूप से एकमात्र ऐसी संस्कृति हैं जो महिला देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। लेकिन हाल के कई फैसले हमें पितृसत्ता और लैंगिक रूढ़िवादिता का दोषी ठहराते हैं… जो यहाँ कभी था ही नहीं। भारत के राष्ट्रपति से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जजों तक, हम सभी अपनी महिला देवी-देवताओं के सामने नतमस्तक होते हैं।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का कोर्ट के सामने कहना है कि 2018 का सबरीमाला फैसला अनुच्छेद 26 में ‘उसके किसी भी अनुभाग’ (any section thereof) शब्द की अनदेखी करता है। सबरीमाला में हर धर्म के लोग जा सकते हैं। वे विभिन्न संप्रदायों से निकले हुए एक “अनुभाग” का निर्माण करते हैं और ऐसे अनुभाग की मान्यताओं की रक्षा की जानी चाहिए। सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया कि पूर्व में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि अंधविश्वास को संरक्षण नहीं दिया जा सकता। लेकिन यह कौन तय करेगा कि कोई चीज़ अंधविश्वास है या अनिवार्य धार्मिक प्रथा? अदालतें निश्चित रूप से यह तय नहीं कर सकतीं।
विज्ञान तर्क पर आधारित है और धर्म विश्वास पर’ : सुप्रीम कोर्ट
न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि यहाँ अंतर यह है कि विज्ञान तर्क पर आधारित है और धर्म विश्वास पर। न्यायमूर्ति सुंदरेश ने सॉलिसिटर जनरल से पूछा, “आपके अनुसार, न्यायिक समीक्षा की शक्ति काफी सीमित है। अदालत विशेषज्ञ की भूमिका नहीं निभा सकती?”
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अगर कोई दावा करता है कि नरभक्षण (cannibalism) उसके धर्म का हिस्सा है, तो अदालतों को हस्तक्षेप करने में संकोच नहीं करना चाहिए। यह अनैतिक है। इस निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए अदालतों को किसी धर्मशास्त्रीय अभ्यास (theological exercise) की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि पाकिस्तान में ecclesiastical (धार्मिक/मज़हबी) अदालतें होती हैं।
अदालतें विशेषज्ञों की राय की जांच करने के लिए साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) द्वारा सशक्त हैं: न्यायमूर्ति बागची
न्यायमूर्ति जोयमाल्य बागची ने सुनवाई के दौरान पूछा कि क्या अदालतें दीवानी मुकदमों (civil suits) में धार्मिक प्रथाओं की अनिवार्यता तय नहीं कर सकतीं ? उन्होंने कहा कि न्यायाधीश विज्ञान के विशेषज्ञ नहीं होते हैं फिर भी, अदालतों को साक्ष्य अधिनियम (Evidence Act) द्वारा विशेषज्ञों की राय की जांच करने और ‘विशेषज्ञों का विशेषज्ञ’ (expert of experts) बनने का अधिकार प्राप्त है। वहीं न्यायमूर्ति नागरत्ना का कहना था कि यदि किसी सामाजिक बुराई को धार्मिक प्रथा का रंग दिया जाता है, तो अदालत निश्चित रूप से उन दोनों के बीच अंतर कर सकती है। उन्होंने कहा कि सामाजिक बुराइयों को धार्मिक रंग दिया जा सकता है, और ऐसी स्थिति में उन दोनों के बीच भेद करने के लिए अदालतें हस्तक्षेप कर सकती हैं। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि इसका उत्तर अनुच्छेद 25(2)(b) में पाया जा सकता है। अर्थात, सामाजिक सुधार के लिए कानून बनाना विधायिका (legislature) का काम है।
न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने एक सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण सवाल खड़े करते हुए पूछा कि “क्या आप यह कह रहे हैं कि एक निश्चित बिंदु पर अदालतों को किसी धार्मिक प्रथा की ‘अनिवार्यता’ (essentiality) की जांच में नहीं पड़ना चाहिए?” तो इस पर केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का जवाब था कि: “मैं यह कह रहा हूँ कि यह—धार्मिक प्रथा की अनिवार्यता—न्यायिक समीक्षा (judicial review) के दायरे में नहीं आ सकती है।”
नौ-न्यायाधीशों की पीठ की सदस्य न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धर्म के प्रचार (propagate) के अधिकार के संदर्भ में टिप्पणी की। उन्होंने टिप्पणी की कि धर्म के प्रचार और जबरन धर्मांतरण के बीच अंतर होता है। यहाँ जिस चीज़ को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है, वह धर्म का प्रचार है।



