Pahalgam Terrorist Attack: आतंकियों को पनाह देने का पाकिस्तानी कबूलनामा

बीएस राय। पिछले कुछ समय से भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में तनाव की लहरें चल रही हैं, लेकिन हाल ही में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए बर्बर आतंकी हमले ने इस तनाव को और खतरनाक मोड़ दे दिया है। इस हमले में निर्दोष नागरिकों और सुरक्षा बलों को निशाना बनाया गया, जिससे पूरे देश में गुस्से की लहर है।

इस हमले की पृष्ठभूमि में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का एक बयान सामने आया है, जिसने दोनों देशों के बीच तनाव को और बढ़ा दिया है। आसिफ ने एक इंटरव्यू में माना है कि पाकिस्तान ने पिछले दशकों में आतंकवादियों को समर्थन, प्रशिक्षण और पनाह दी है- और वह भी सिर्फ अपने हितों के लिए नहीं, बल्कि अमेरिका और पश्चिमी देशों की रणनीति के तहत।

एक ऐसा कबूलनामा जिसने दुनिया की नींद उड़ा दी ब्रिटिश चैनल स्काई न्यूज की पत्रकार यल्दा हकीम को दिए इंटरव्यू में जब आसिफ से पूछा गया कि क्या पाकिस्तान का आतंकवादियों को समर्थन देने का लंबा इतिहास रहा है, तो उन्होंने साफ शब्दों में कहा, “हां, हम पिछले तीन दशकों से अमेरिका और पश्चिम के लिए यह गंदा काम कर रहे हैं।”

यह बयान न केवल पाकिस्तान के दोहरे चरित्र को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि किस तरह से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आतंक को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है।

आसिफ ने यह भी कहा कि अगर पाकिस्तान ने सोवियत संघ के खिलाफ युद्ध और 9/11 के बाद के युद्ध में हिस्सा नहीं लिया होता, तो उसका रिकॉर्ड बेदाग होता। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इन तथ्यों को खुद पाकिस्तान के एक वरिष्ठ मंत्री ने स्वीकार किया है, जिससे उसकी विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

पाकिस्तान के कबूलनामे और पहलगाम हमले के बाद भारत ने अब पहले से भी ज्यादा कड़ा रुख अपनाया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ शब्दों में कहा है कि, “अब आतंक के बचे-खुचे गढ़ों को नष्ट करने का समय आ गया है।” उन्होंने वादा किया कि हमले के दोषियों और इसकी साजिश रचने वालों को ऐसी सजा दी जाएगी, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की होगी।

इस बीच, 1960 की सिंधु जल संधि को निलंबित करके भारत ने पाकिस्तान को संदेश दिया है कि ‘पुराने नियमों’ का दौर खत्म हो चुका है। पाकिस्तान को यह समझ लेना चाहिए कि आतंकवाद अब उसकी रणनीतिक संपत्ति नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसके अलग-थलग पड़ने का कारण है।

पाकिस्तानी मंत्री का कबूलनामा न केवल भारत के लिए बल्कि पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए चेतावनी है। वैश्विक शक्तियों के लिए यह सोचने का समय आ गया है कि जब आतंकवाद का इस्तेमाल राजनीतिक हितों के लिए किया जा रहा है, तो उसे कब तक नजरअंदाज किया जाएगा।

भारत ने अब निर्णायक मोर्चा खोल दिया है। सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान अपने तौर-तरीके सुधारेगा या खुद को वैश्विक परिदृश्य से अलग-थलग कर लेगा? यह घटना न केवल उपमहाद्वीप की सुरक्षा रणनीति में बदलाव लाएगी बल्कि वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ सख्त और सामूहिक रुख की भी मांग करेगी।

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