एक शहर, दो सपने… डूरंड कप में शिलांग की ऐतिहासिक फुटबॉल डर्बी
शिलांग में ज़्यादातर शामों में फुटबॉल सिर्फ एक खेल नहीं होता, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा होता है। यह स्कूलों के मैदानों से लेकर मोहल्लों की पिचों और सड़क किनारे होने वाली चर्चाओं तक फैला रहता है।
बच्चे स्कूल की छुट्टी होते ही सबसे नज़दीकी मैदान की ओर दौड़ पड़ते हैं, जबकि बड़े प्रशंसक चाय की चुस्कियों के बीच टीम की संभावित एकादश पर बहस करते दिखाई देते हैं। यहां फुटबॉल कोई आयोजन नहीं, बल्कि जीवन की एक स्वाभाविक दिनचर्या है।
लेकिन शुक्रवार की शाम शिलांग की फुटबॉल कहानी दो अलग-अलग सपनों में बंट जाएगी। एक सपना उस क्लब का है, जो अपने अधूरे सफर को मुकाम तक पहुंचाना चाहता है। दूसरा उस क्लब का, जो भारत के सबसे पुराने फुटबॉल टूर्नामेंट के मंच पर पहली बार कदम रखने जा रहा है।
जब शिलांग लाजोंग एफसी, जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में नोंगकसेह स्पोर्ट्स एंड सोशल कल्चरल क्लब (एसएसएंडसीसी) के खिलाफ 135वें इंडियनऑयल डूरंड कप के ग्रुप-ई के उद्घाटन मुकाबले के लिए मैदान पर उतरेगा, तब यह सिर्फ एक फुटबॉल मैच की शुरुआत नहीं होगी। यह मेघालय की समृद्ध फुटबॉल यात्रा के एक और अध्याय का आरंभ भी होगा।
लगातार तीसरे वर्ष शिलांग डूरंड कप की मेज़बानी कर रहा है, लेकिन पहली बार ऐसा होगा जब शहर के तीन स्थानीय क्लब एशिया के सबसे पुराने फुटबॉल टूर्नामेंट में हिस्सा लेंगे। और इससे बेहतर शुरुआत शायद हो भी नहीं सकती थी—राज्य के सबसे स्थापित पेशेवर क्लब और उसके सबसे नए चुनौतीकर्ता के बीच एक स्थानीय डर्बी।
एक सपना वर्षों की परंपरा और डूरंड कप का बहुप्रतीक्षित खिताब जीतने की चाह पर टिका है। दूसरा पहली बार इस मंच पर उतरने के उत्साह और इस विश्वास से प्रेरित है कि हर स्थापित क्लब कभी न कभी एक नया नाम ही था। दोनों मिलकर इस बात का प्रमाण हैं कि मेघालय का फुटबॉल कितना आगे बढ़ चुका है।
शिलांग लाजोंग को किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है। वर्षों से यह क्लब राज्य में फुटबॉल का ध्वजवाहक रहा है और यहां से निकली कई पीढ़ियों के खिलाड़ी देशभर के क्लबों के साथ-साथ भारतीय राष्ट्रीय टीम तक पहुंचे हैं।
पिछले दो संस्करणों में लगातार डूरंड कप के सेमीफाइनल तक पहुंचकर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाली ‘रेड्स’ इस बार अधूरा सपना पूरा करने के इरादे से लौटी है।
मुख्य कोच बिरेन्द्र थापा, जिन्होंने टीम को उस यादगार सफर तक पहुंचाया था, जानते हैं कि इस बार अपेक्षाएं अलग हैं। उन्होंने कहा, “आप किसी भी टूर्नामेंट में सिर्फ लोगों या प्रशंसकों को खुश करने के लिए नहीं खेलते।
आपका लक्ष्य जीतना होता है। आप फाइनल में पहुंचना चाहते हैं और चैंपियन बनना चाहते हैं। पिछली बार हम सेमीफाइनल में हार गए थे। इस बार हमारा लक्ष्य फाइनल में पहुंचकर ट्रॉफी जीतना है।”
लेकिन लाजोंग के अनुभव के बावजूद थापा को आसान मुकाबले की उम्मीद नहीं है। उन्होंने कहा, “वे एक अच्छी टीम हैं। उन्होंने शिलांग के कई अच्छे खिलाड़ियों को अपने साथ जोड़ा है। मुकाबला कठिन होगा, लेकिन हम पूरी ताकत के साथ उतरेंगे।”
दूसरी ओर ड्रेसिंग रूम का माहौल भी उतना ही आत्मविश्वास से भरा हुआ है। नोंगकसेह एसएसएंडसीसी के लिए शुक्रवार क्लब के इतिहास का सबसे बड़ा दिन है।
मेघालय स्टेट लीग का खिताब जीतने के बाद अब यह क्लब पहली बार राष्ट्रीय मंच पर उतरने जा रहा है। भले ही क्लब डूरंड कप में पदार्पण कर रहा हो, लेकिन उसकी टीम में ऐसे कई खिलाड़ी हैं जिन्हें इस प्रतियोगिता का अनुभव है।
इनमें कप्तान हार्डी क्लिफ नोंगब्री भी शामिल हैं, जो दिलचस्प संयोग से अपने पूर्व क्लब शिलांग लाजोंग के खिलाफ मैदान में उतरेंगे। वह 133वें डूरंड कप में सेमीफाइनल तक पहुंचने वाली शिलांग लाजोंग टीम के कप्तान रह चुके हैं।
नोंगब्री ने कहा, “शिलांग लाजोंग बहुत अच्छी टीम है। मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूं क्योंकि वे पहले मेरे साथी खिलाड़ी थे।” लेकिन पुरानी यादें पहली सीटी बजते ही पीछे छूट जाएंगी।
उन्होंने कहा, “हमारे पास अनुभवी खिलाड़ी हैं। कई खिलाड़ियों ने आई-लीग और आईएसएल में खेला है। हमारे पास जूनियर और सीनियर खिलाड़ियों का अच्छा मिश्रण है। हम अपना सर्वश्रेष्ठ देंगे और जीतने की पूरी कोशिश करेंगे।”
उनकी बातों में उस शांत आत्मविश्वास की झलक साफ दिखाई देती है, जिसके साथ नोंगकसेह ने यह लंबा सफर तय किया है। अब यह टीम खुद को सिर्फ अंडरडॉग कहलाने तक सीमित नहीं रखना चाहती। मुख्य कोच जोसेफ नाइक का मानना है कि उनकी टीम ने यहां तक पहुंचने का अधिकार अपने प्रदर्शन से अर्जित किया है।
उन्होंने कहा, “हम इस अवसर के लिए आभारी हैं क्योंकि डूरंड कप बेहद प्रतिष्ठित प्रतियोगिता है। हम शिलांग लाजोंग का सम्मान करते हैं। उन्होंने भारतीय फुटबॉल में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। लेकिन हमने भी बहुत मेहनत की है और अब समय आ गया है कि हम अपना काम पूरा करें।”
शायद इस मुकाबले की सबसे खूबसूरत बात यह है कि दोनों टीमों के बीच कोई कटुता नहीं है। कई खिलाड़ी एक-दूसरे को अच्छी तरह जानते हैं। कुछ एक ही ड्रेसिंग रूम साझा कर चुके हैं, जबकि कई स्कूल के दिनों से एक-दूसरे के खिलाफ खेलते आए हैं।
प्रतिद्वंद्विता स्थानीय है, लेकिन सम्मान दोनों तरफ बराबर है। शिलांग लाजोंग के कप्तान केनस्टार खारशोंग भी इसी भावना को दोहराते हैं। उन्होंने कहा, “उनके पास कुछ अच्छे और अनुभवी खिलाड़ी हैं। मुझे लगता है कि यह बहुत अच्छा मुकाबला होगा। उम्मीद है कि समर्थक बड़ी संख्या में आएंगे और इसका आनंद लेंगे।”
अगर खिलाड़ी मैदान पर इस मुकाबले को यादगार बनाने वाले हैं, तो उनके पीछे ऐसे अनगिनत लोग भी हैं जिन्होंने पिछले कई सप्ताह से इस मंच को तैयार करने में अपना योगदान दिया है। जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम के आसपास अंतिम तैयारियां प्रशिक्षण सत्र समाप्त होने के काफी देर बाद तक जारी रहती हैं।
शिलांग में डूरंड कप के तीनों संस्करणों के लिए पिच तैयार करने वाले क्यूरेटर उत्तम कलिता के लिए हर टूर्नामेंट अपने साथ एक नया उत्साह लेकर आता है।
वे कहते हैं, “जब भी यहां मैच होते हैं, हमारा उत्साह अपने आप बढ़ जाता है। मैदान को बेहतरीन स्थिति में रखना हमारी जिम्मेदारी है और हम इसके लिए हरसंभव प्रयास करते हैं।”
लेकिन कल का मुकाबला कौन जीतेगा, इस सवाल पर वे भी कोई भविष्यवाणी करने को तैयार नहीं हैं। “दोनों टीमें अच्छी हैं। उनके प्रदर्शन के बाद ही पता चलेगा कि कौन बेहतर साबित होता है।”
कुछ ही दूरी पर राज्य खेल परिषद के फील्ड अधिकारी निकोलस भी तैयारियों को संतोष के साथ देख रहे हैं। वे कहते हैं, “ऐसे टूर्नामेंट यहां होना अच्छी बात है क्योंकि यह स्टेडियम अंतरराष्ट्रीय स्तर के मुकाबलों के लिए बनाया गया है।” उनकी एकमात्र भविष्यवाणी भी दिल से निकलती है। “उम्मीद है कि हमारी स्थानीय टीमों में से कोई एक फाइनल तक पहुंचे।”
मैदान के पीछे काम करने वाले स्थानीय आयोजकों ने भी इस प्रतियोगिता को साल-दर-साल बढ़ते हुए देखा है। शिलांग में लगातार तीनों डूरंड कप संस्करणों से जुड़ी स्मिता छेत्री के लिए हर नया साल नई जिम्मेदारियां लेकर आता है।
वह कहती हैं, “हर साल लोगों की अपेक्षाएं और बढ़ जाती हैं। यह हमारा तीसरा वर्ष है और लोग देख चुके हैं कि पिछले संस्करण कितने सफल रहे थे।”
शिलांग के कई घरों की तरह उनके घर में भी फुटबॉल की निष्ठाएं अलग-अलग बंटी हुई हैं। वह हंसते हुए कहती हैं, “मेरी बेटी शिलांग लाजोंग का समर्थन कर रही है। मैं नोंगकसेह का समर्थन कर रही हूं क्योंकि स्कूल के दिनों में मैं उसी इलाके से खेला करती थी।”लेकिन अंत में उनकी इच्छा भी मेघालय के हर फुटबॉल प्रेमी जैसी ही है।
“हम चाहते हैं कि हमारी स्थानीय टीमों में से कोई एक फाइनल तक पहुंचे।” स्टेडियम के बाहर समर्थक भी अपना-अपना फैसला कर चुके हैं। कुछ को शिलांग लाजोंग के अनुभव पर भरोसा है, तो कुछ मानते हैं कि राज्य चैंपियन नोंगकसेह इस बार इतिहास रच सकती है।
युवा समर्थक वेबांशार खारकोंगोर शिलांग में डूरंड कप के अधिकांश बड़े मुकाबले देख चुके हैं। उनके लिए यह प्रतियोगिता अब सिर्फ फुटबॉल तक सीमित नहीं रही। वे कहते हैं, “इससे खासी खिलाड़ियों को बड़ी टीमों के खिलाफ खेलने का मौका मिलता है। यहां फुटबॉल परिवारों और दोस्तों को जोड़ता है।” लेकिन जब पसंदीदा टीम चुनने की बात आती है, तो उनका दिल अब भी ‘रेड्स’ के साथ है।
“अनुभव के हिसाब से शिलांग लाजोंग को जीतना चाहिए। लेकिन मुकाबला बहुत अच्छा होगा।” उधर, पास ही स्थित शिलांग स्पोर्ट्स एसोसिएशन मैदान में एक छोटी बच्ची ने बड़े विनम्र तरीके से बातचीत करने से इनकार कर दिया।
वजह यह नहीं थी कि उसके पास अपनी राय नहीं थी, बल्कि उसे डर था कि कहीं मैच शुरू होने से पहले कुछ बोल देने से उसकी प्रिय शिलांग लाजोंग टीम के लिए अपशकुन न हो जाए।
शायद शिलांग के फुटबॉल प्रेम को आंकड़ों से कहीं बेहतर यही छोटी-सी घटना बयान करती है। शुक्रवार का मुकाबला सिर्फ तीन अंकों या ग्रुप-ई में शुरुआती बढ़त हासिल करने की लड़ाई नहीं है। यह उस क्लब की कहानी है जो देश के सर्वश्रेष्ठ क्लबों में अपनी जगह और मजबूत करना चाहता है।
यह उस दूसरे क्लब की कहानी है जो पहली बार राष्ट्रीय मंच पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने आया है। यह उस शहर की कहानी भी है जिसने डूरंड कप को पूरे दिल से अपनाया है और जो अब भारतीय फुटबॉल के सबसे बड़े मंचों में से एक पर अपने तीन स्थानीय क्लबों का प्रतिनिधित्व करते हुए गर्व महसूस कर रहा है।
शुक्रवार रात जब अंतिम सीटी बजेगी, तब एक टीम के खाते में तीन अंक होंगे। लेकिन उससे बहुत पहले दोनों सपने एक ही मंच साझा कर चुके होंगे—एक इतिहास रचने की कोशिश में, दूसरा इतिहास लिखने की शुरुआत करते हुए। और मेघालय फुटबॉल के लिए शायद यही सबसे बड़ी जीत होगी।



