करियर खत्म होने की आशंका से कॉमनवेल्थ रजत तक, मुरली श्रीशंकर का ऐतिहासिक कमबैक
दो साल पहले मुरली श्रीशंकर की गंभीर चोट का इलाज कर रहे सर्जन ने कहा था कि वह शायद दोबारा कभी दौड़ नहीं सकेंगे, लंबी कूद प्रतियोगिता में उतरना तो दूर की बात है। आज उसी खिलाड़ी ने अपने जज्बे और मेहनत से इस भविष्यवाणी को गलत साबित कर दिया।
उनके पिता एस मुरली घबरा गए थे क्योंकि अप्रैल 2024 में पलक्कड़ में नियमित अभ्यास सत्र के दौरान एक हादसे में उनका बेटा चोटिल हो गया था। पदक और आठ मीटर की कूद के बारे में तो भूल जाइये। पेरिस ओलंपिक 2024 भी भूल जाइये।
श्रीशंकर के पिता और कोच बस अपने बेटे को बैसाखियों के बिना अपने पैरों पर फिर खड़े होते देखना चाहते थे। मुरली ने कहा ,‘‘ मैं सिर्फ इतना चाहता था कि वह बैसाखियों के बिना चल सके।’’ श्रीशंकर ने तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ते हुए बुधवार को राष्ट्रमंडल खेलों में लगातार दूसरा रजत पदक जीता तो ये यादें ताजा हो गई।

बर्मिंघम में उपविजेता रहने के चार साल बाद उन्होंने 8 . 09 मीटर की कूद लगाकर वापसी के बाद अपना पहला अंतरराष्ट्रीय पदक जीता। मुरली ने कहा ,‘‘ यह चमत्कार ही है कि वह वापसी कर सका और पदक जीत रहा है। ऐसी चोट के बाद कोई यह कमाल नहीं कर सकता था।’’
चोट के बाद वह 2024 में पूरे सत्र से बाहर रहे और ओलंपिक में पदार्पण भी नहीं कर पाये। मुरली ने कहा ,‘‘ उसने धीरे धीरे अभ्यास शुरू किया। अप्रैल 2025 में उसने तीन मीटर की कूद लगाई। मैं उसे देख नहीं पाता था। मैं डर गया था। वह मानसिक रूप से बहुत मजबूत है। उसने सिर्फ अपनी वापसी पर फोकस रखा।’’
वहीं श्रीशंकर ने कहा ,‘‘ मैं यह नहीं कहूंगा कि यह चमत्कार था। लेकिन मैं कृतज्ञ हूं कि वापिस देश के लिये खेल सका। यह पदक उन सभी के लिये है जिन्होंने पिछले दो साल के कठिन दौर में मेरा साथ दिया। उन सभी के लिये जिन्होंने कहा था कि मैं फिर कभी कूद नहीं सकूंगा।’’



