न्याय के मंदिर में ‘फर्जी डिग्री’ का दीमक
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख—केंद्र, BCI और राज्य बार कौंसिलों से मांगा विस्तृत जवाब

विवेक ओझा/ नई दिल्ली: देश की न्याय व्यवस्था और अदालतों की गरिमा को अंदर ही अंदर खोखला कर रहे एक बेहद संवेदनशील और गंभीर मुद्दे पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने आज कड़ा और सख्त रुख अख्तियार किया है। अदालतों में वकीलों की बढ़ती फर्जी डिग्रियों (Fake Law Degrees) और बिना योग्यता के वकालत करने वाले कथित पैरोकारों पर गहरी चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार, बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और सभी राज्य बार कौंसिलों (State Bar Councils) को नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब तलब किया है।
अदालत ने स्पष्ट किया है कि कानून और न्याय का पेशा कोई सामान्य व्यवसाय नहीं है, बल्कि यह समाज के अंतिम व्यक्ति को न्याय दिलाने का सबसे पवित्र माध्यम है। ऐसे में अगर न्याय के इस मंदिर की बुनियादी नींव (काले कोट की साख) ही फर्जी डिग्रियों के सहारे टिकी होगी, तो पूरी न्याय व्यवस्था से आम जनता का भरोसा उठ जाएगा।
अदालत की गंभीर चिंता: ‘फर्जी वकीलों’ से किसको खतरा?
सुनवाई के दौरान जजों की पीठ ने इस बात पर गहरा असंतोष और आश्चर्य व्यक्त किया कि देश भर की विभिन्न जिला अदालतों, ट्रिब्यूनलों और यहाँ तक कि उच्च न्यायालयों में भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां लोग बिना किसी वैध एलएलबी (LLB) डिग्री या फर्जी इनरोलमेंट नंबर के सहारे सालों से वकालत कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात को रेखांकित किया कि यह समस्या केवल कुछ व्यक्तियों के धोखे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके परिणाम बहुत भयानक हैं:
* मुवक्किलों के साथ खिलवाड़: एक आम नागरिक अपनी जीवन भर की कमाई और भरोसा एक वकील के हाथों में सौंप देता है। अगर वह वकील ही फर्जी है, तो मुवक्किल का पूरा केस और उसका भविष्य बर्बाद होना तय है।
* अदालतों का समय नष्ट होना: अयोग्य और फर्जी लोग कानूनी प्रक्रियाओं की सही समझ न होने के कारण अदालतों में गलत याचिकाएं दाखिल करते हैं, जिससे पहले से ही मुकदमों के बोझ से दबी न्यायपालिका का कीमती समय बर्बाद होता है।
शीर्ष अदालत का कड़ा रुख: BCI और राज्य बार कौंसिलों की जवाबदेही तय
सर्वोच्च न्यायालय ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि देश में वकालत के पेशे को विनियमित (Regulate) करने और इसकी साख बनाए रखने की प्राथमिक जिम्मेदारी उनकी है। अदालत ने पूछा कि देश भर के लॉ कॉलेजों और वकीलों के इनरोलमेंट (पंजीकरण) के भौतिक सत्यापन (Physical Verification) का जो काम सालों से लंबित है, उसे अभी तक पूरी कड़ाई से क्यों नहीं निपटाया गया?
अदालत ने अपने निर्देश में सभी पक्षों से मुख्य रूप से इन बिंदुओं पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है:
1. डिग्रियों के सत्यापन का स्टेटस: वर्तमान में देश भर की बार कौंसिलों में पंजीकृत वकीलों की डिग्रियों के सत्यापन (Verification) की मौजूदा स्थिति क्या है?
2. लॉ कॉलेजों की निगरानी: देश भर में कुकुरमुत्ते की तरह खुल रहे ‘फर्जी’ या बिना मान्यता प्राप्त लॉ कॉलेजों के खिलाफ क्या दंडात्मक कार्रवाई की गई है?
3. डिजिटल डेटाबेस का निर्माण: क्या सभी वकीलों के इनरोलमेंट और डिग्रियों को एक केंद्रीय और पारदर्शी डिजिटल पोर्टल से जोड़ने की कोई योजना है, जिससे कोई भी मुवक्किल अपने वकील की प्रामाणिकता आसानी से जांच सके?
न्याय प्रणाली की साख बचाने की आखिरी जंग
यह अदालती निर्देश भारत के कानूनी इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। अब तक इस मुद्दे पर बार काउंसिल और स्थानीय बार एसोसिएशनों के स्तर पर ढुलमुल रवैया अपनाया जाता रहा है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सीधे हस्तक्षेप के बाद अब किसी भी स्तर पर ढिलाई बरतना नामुमकिन होगा।
केंद्र सरकार और बीसीआई को अब तीन महीने के भीतर एक ठोस कार्ययोजना और हलफनामा अदालत के सामने पेश करना होगा। यदि इस आदेश के बाद देश भर के वकीलों के दस्तावेज़ों की सघन जांच (Scrutiny) शुरू होती है, तो यह न्यायपालिका के भीतर का सबसे बड़ा ‘शुद्धीकरण अभियान’ साबित होगा। काले कोट की मर्यादा और न्याय के प्रति आम आदमी के विश्वास को अक्षुण्ण रखने के लिए इस दीमक को जड़ से मिटाना बेहद जरूरी हो चुका है।



