भारत के अंतरिक्ष इतिहास में स्वर्णिम अध्याय
'स्काईरूट एयरोस्पेस' बनी देश की पहली प्राइवेट स्पेस-टेक 'यूनिकॉर्न', रचा नया इतिहास

भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर (Private Space Sector) ने वह मुकाम हासिल कर लिया है, जिसका सपना देश वर्षों से देख रहा था। भारतीय अंतरिक्ष स्टार्टअप ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ (Skyroot Aerospace) ने 1 बिलियन डॉलर (लगभग 8,300 करोड़ रुपये) का मूल्यांकन (Valuation) पार करते हुए इतिहास रच दिया है। इसके साथ ही स्काईरूट भारत की पहली और एकमात्र प्राइवेट स्पेस-टेक ‘यूनिकॉर्न’ (Unicorn) कंपनी बन गई है। यह उपलब्धि ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत अभियान की सबसे बड़ी वैश्विक जीत है।
जिस तरह एलन मस्क (Elon Musk) की कंपनी स्पेसएक्स (SpaceX) ने अमेरिकी अंतरिक्ष उद्योग की तस्वीर बदल दी, उसी तर्ज पर अब भारतीय स्टार्टअप्स भी अंतरिक्ष के अनंत आकाश में अपना परचम लहरा रहे हैं। हैदराबाद स्थित एयरोस्पेस कंपनी ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ ने वैश्विक निवेशकों से फंडिंग का एक नया और विशाल दौर सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है, जिसके बाद कंपनी का कुल मूल्यांकन 1 अरब डॉलर के जादुई आंकड़े को पार कर गया है।
क्या होता है ‘यूनिकॉर्न’ स्टार्टअप?
स्टार्टअप और व्यापारिक जगत में ‘यूनिकॉर्न’ (Unicorn) उस निजी कंपनी को कहा जाता है जिसका बाजार मूल्यांकन (Market Valuation) 1 अरब डॉलर (1 Billion Dollars) या उससे अधिक हो जाता है। भारत में ई-कॉमर्स, फिनटेक और सॉफ्टवेयर क्षेत्र में तो 100 से अधिक यूनिकॉर्न हैं, लेकिन रॉकेट और अंतरिक्ष विज्ञान (Space-Tech) जैसे अत्यंत जटिल और जोखिम भरे क्षेत्र में किसी भारतीय कंपनी का इस मुकाम तक पहुंचना एक ऐतिहासिक और दुर्लभ घटना है।
स्काईरूट की उपलब्धियां और ‘विक्रम’ रॉकेट
वर्ष 2018 में इसरो (ISRO) के पूर्व वैज्ञानिकों—पवन कुमार चंदाना और नागा भरत डाका—द्वारा स्थापित स्काईरूट ने अपनी यात्रा शून्य से शुरू की थी। इस कंपनी ने सबसे पहले तब इतिहास रचा था जब इसने भारत के पहले निजी रॉकेट ‘विक्रम-एस’ (Vikram-S) का सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में प्रक्षेपण (Launch) किया था।
कंपनी मुख्य रूप से कम लागत वाले और तेजी से असेंबल होने वाले छोटे उपग्रह प्रक्षेपण यानों (Small Satellite Launch Vehicles) के निर्माण पर ध्यान केंद्रित कर रही है। उनका लक्ष्य है कि सैटेलाइट लॉन्च करने की प्रक्रिया को इतना आसान और किफायती बना दिया जाए जितना कि एक कैब (Cab) बुक करना। कार्बन फाइबर (Carbon Fiber) से बने उनके 3D प्रिंटेड इंजन दुनिया भर में तकनीक का लोहा मनवा रहे हैं।
इसरो (ISRO) और IN-SPACe का भारी समर्थन
स्काईरूट की इस अपार सफलता के पीछे केंद्र सरकार की ‘अंतरिक्ष सुधार नीतियों’ का बहुत बड़ा हाथ है। IN-SPACe (इन-स्पेस) जैसी नोडल एजेंसी के गठन के बाद निजी कंपनियों को इसरो (ISRO) की विश्वस्तरीय परीक्षण सुविधाओं और लॉन्च पैड (श्रीहरिकोटा) के उपयोग की अनुमति मिली। इसी सरकारी समर्थन ने विदेशी निवेशकों (Global Investors) का भारतीय स्पेस स्टार्टअप्स पर भरोसा बढ़ाया है।
भारत का स्पेस इकोनॉमी (Space Economy) में बढ़ता दबदबा
स्काईरूट के यूनिकॉर्न बनने से वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ेगी। वर्तमान में 400 अरब डॉलर की ग्लोबल स्पेस इकॉनमी में भारत की हिस्सेदारी केवल 2 प्रतिशत है। लेकिन स्काईरूट जैसी कंपनियों के उभरने से दुनिया भर की संचार और इमेजिंग (Imaging) कंपनियां अब अपने छोटे सैटेलाइट्स लॉन्च करने के लिए भारत का रुख करेंगी। यह केवल स्काईरूट की नहीं, बल्कि हर उस भारतीय वैज्ञानिक की जीत है जो अंतरिक्ष को आम इंसान की पहुंच में लाना चाहता है।



