ईरान के विदेश मंत्री ने कहा, विरोधियों को छोड़कर सबके लिए खुला है होर्मुज मार्ग

नई दिल्ली : ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने शुक्रवार को कहा कि ईरान भी होर्मुज जलडमरुमध्य को पूरी तरह सुरक्षित और खुला रखना चाहता है। युद्धरत देशों के जहाजों को छोड़कर अधिकांश जहाजों के लिए यह मार्ग खुला भी है। हालांकि परिस्थितियों के कारण ईरानी सेना के साथ समन्वय जरूरी है। भारत के कई जहाजों को भी ईरान ने सुरक्षित मार्ग उपलब्ध कराया है।
ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक के लिए नई दिल्ली आए ईरान के विदेश मंत्री अराघची ने शुक्रवार को यहां पत्रकार वार्ता को संबोधित किया। उन्होंने कहा, “हॉर्मुज जलडमरूमध्य के संबंध में हमारी भी यही इच्छा है कि इसे पूरी तरह से फिर से खोल दिया जाए। जहाँ तक हमारा सवाल है, हॉर्मुज जलडमरूमध्य खुला हुआ है या नहीं। सभी जहाज़ वहाँ से गुज़र सकते हैं- सिवाय उन देशों के जहाज़ों के जो हमारे साथ युद्ध की स्थिति में हैं और हमारे विरुद्ध लड़ रहे हैं। जो जहाज़ वहाँ से गुजरना चाहते हैं, उन्हें जाहिर तौर पर हमारी सेना के साथ समन्वय स्थापित करना चाहिए क्योंकि वहाँ कुछ बाधाएँ मौजूद हैं। ऐसे में हम उन्हें सुरक्षित मार्ग दिखाएँगे, जैसा कि हमने कई भारतीय जहाज़ों के साथ किया है।”
ईरानी विदेश मंत्री ने कहा कि फिलहाल संघर्ष विराम लागू है, हालांकि स्थिति नाजुक बनी हुई है। उनका कहना था कि ईरान किसी भी दबाव या सैन्य कार्रवाई के आगे नहीं झुकेगा। समस्या का समाधान केवल कूटनीति तथा “विन-विन” समझौते से ही संभव है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ ताकतें अमेरिका को फिर से युद्ध की ओर धकेलना चाहती हैं।
अराघची ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ हुई बातचीत का जिक्र करते हुए कहा कि भारत और ईरान की चिंताएं तथा हित काफी हद तक समान हैं। उन्होंने कहा कि दोनों देश प्राचीन सभ्यताएं हैं और आपसी सम्मान, व्यापार तथा रणनीतिक सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। ईरान ने भारतीय मानवीय सहायता और समर्थन की भी सराहना की।
अराघची ने चाहबहार पोर्ट को भारत-ईरान सहयोग का प्रतीक बताते हुए कहा कि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण इसकी रफ्तार धीमी हुई है। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह बंदरगाह भारत के लिए मध्य एशिया, काकेशस और यूरोप तक पहुंच का महत्वपूर्ण मार्ग बनेगा और भारत इसके विकास में अपनी भूमिका जारी रखेगा।
अब्बास अराघची ने कहा कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार नहीं चाहता था और 2015 के परमाणु समझौते के जरिए उसने यह साबित भी किया। उन्होंने दोहराया कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण है। साथ ही उन्होंने कहा कि अमेरिका पर भरोसा करना मुश्किल है क्योंकि वार्ता के दौरान ही अमेरिका और इज़राइल ने ईरान पर हमला किया तथा लगातार विरोधाभासी संदेश दिए।
अराघची ने कहा कि पाकिस्तान की मध्यस्थता पूरी तरह विफल नहीं हुई है लेकिन अमेरिका के व्यवहार और अविश्वास के कारण प्रक्रिया कठिन बनी हुई है। उन्होंने चीन की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि चीन पहले भी ईरान-सऊदी संबंध बहाल कराने में मदद कर चुका है और यदि वह कूटनीति को आगे बढ़ाने में सहायता करता है तो ईरान उसका स्वागत करेगा।



