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बांसुरी केवल एक वाद्ययंत्र नहीं, हमारी श्वास है : चेतन जोशी

नई दिल्ली : बांसुरी वादक एवं संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित पं. चेतन जोशी ने गुरुवार को कहा कि बांसुरी केवल एक वाद्ययंत्र नहीं, हमारी श्वास है। इसे बनाए रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

 

पं चेतन जोशी ने यह बात दिल्ली स्थित इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) में “भारतीय कला, सौंदर्य शास्त्र एवं सांस्कृतिक धरोहर” व्याख्यानमाला के अंतर्गत “भारतीय कला धरोहर : बांसुरी के विशेष संदर्भ में” विषय पर एक विशेष व्याख्यान के दौरान कही। यह कार्यक्रम भारतीय शास्त्रीय संगीत की परम्परा में बांसुरी के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और कलात्मक आयामों पर केंद्रित था।

 

उन्होंने कहा, “पश्चिम में कला की अवधारणा ‘आर्ट फॉर द सेक ऑफ आर्ट’ (कला केवल कला के लिए) है, लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। भारत में कला कभी निरुद्देश्य नहीं होती। यहां कला का उद्देश्य ‘सत्यम्, शिवम, सुंदरम्’ है।”

 

पं. जोशी ने कहा कि बांसुरी मानव निर्मित प्राचीनतम वाद्यों में से एक है। इसका तीनों प्रकार की कलाओं परफॉर्मिंग आर्ट, विजुअल आर्ट और साहित्यिक कला में प्रमुख स्थान है। इतिहास और अध्यात्म दोनों में इसकी प्रमुखता है। अत्यंत प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक इसकी निरंतरता बनी हुई है। यह कभी लुप्त नहीं हुई। हिन्दुस्तानी, कर्नाटक संगीत से लेकर लोक संगीत तक, इसका प्रयोग सभी परम्पराओं में होता है।

 

इस मौके पर आईजीएनसीए के डीन एवं कलानिधि विभाग के अध्यक्ष प्रो. रमेश चंद्र गौड़, प्रो ऋचा कंबोज, ध्रुपद गायक उस्ताद फ़ैयाज़ वसीफ़ुद्दीन डागर और शास्त्रीय गायक पं. विद्याधर व्यास सहित अन्य गणमान्य जन मौजूद रहे।

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