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भारत रत्न पंडित रविशंकर की जयंती: जिन्हें कहा जाता है विश्व संगीत का गॉडफादर

मशहूर सितारवादक और भारत रत्न पंडित रविशंकर की आज जयंती है। भारतीय शास्त्रीय संगीत को दुनिया के हर कोने में पहुंचाने और उसे एक अलग पहचान दिलाने का श्रेय उन्हें ही जाता है। वीटल्स के जॉर्ज हैरीसन ने उन्हें ‘विश्व संगीत का गॉडफादर’ बताया था। पंडित रविशंकर की युवावस्था भाई उदय शंकर के नृत्य समूह के साथ यूरोप और भारत का दौरा करते हुए बीती। उन्होंने साल 1938 में संगीतज्ञ अलाउद्दीन खान से सितार बजाना सीखने के लिए नृत्य छोड़ दिया था। साल 1944 में पढ़ाई पूरी करने के बाद पंडित रविशंकर ने संगीतकार के रूप में सत्यजीत रे के ‘अपू ट्रिलॉजी’ और रिचर्ड एटनबर्ग के ‘गांधी’ के लिए संगीत दिया। सर्वश्रेष्ठ मौलिक स्वरलिपि के लिए वर्ष 1983 में उन्हें जॉर्ज फेंटन के साथ ऑस्कर से नवाजा गया। उन्होंने साल 1949 से 1956 के बीच नई दिल्ली में ऑल इंडिया रेडियो के संगीत निदेशक के रूप में भी काम किया। इसके बाद 1960 के दशक में वायलिन वादक येहुदी मेनुहिन और जॉर्ज हैरीसन के साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत की शिक्षा और प्रस्तुति देकर इसे पश्चिम में लोकप्रिय बनाया।

दिवंगत पंडित रविशंकर भारत के सबसे प्रतिष्ठित संगीत दूत और शास्त्रीय संगीत जगत के एक विशिष्ट व्यक्तित्व थे। एक संगीतकार, कलाकार, शिक्षक और लेखक के रूप में, उन्होंने भारतीय संगीत और संस्कृति की अमूल्य सेवा की।

अपने महान गुरु बाबा अलाउद्दीन खां से वर्षों तक कड़ा प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद, भारत के शास्त्रीय संगीत जगत में स्वयं को स्थापित करते हुए, वे भारतीय शास्त्रीय संगीत के सौंदर्य के प्रसार के लिए पश्चिम की यात्रा पर निकल पड़े। भारतीय शास्त्रीय संगीत को पश्चिम तक पहुंचाने और इसे लोकप्रिय बनाने के अपने अग्रणी कार्य के लिए उनकी सराहना की जाती है।

उन्होंने सात वर्षों तक, दिन में 18 घंटे सितार सीखा और उस वाद्ययंत्र में महारत हासिल की, जिससे अधिकांश दुनिया अनभिज्ञ थी। उन्होंने विश्व संगीत पटल पर सितार को प्रमुख स्थान प्रदान करने के लिए विख्यात अंतरराष्ट्रीय संगीत हस्तियों के साथ काम किया।

वह संगीत में अपने योगदान के लिए और संगीत के माध्यम से सांस्कृतिक सामंजस्य पैदा करने के लिए सुविख्यात रहे हैं। अपने दीर्घ और लब्धप्रतिष्ठित जीवन के दौरान उन्हें 1962 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1992 में रामोन मैग्सेसे पुरस्कार, फ्रांस का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘द नाईट ऑफ द लीजियन ऑफ ऑनर’ तथा ग्रेमी पुरस्कार सहित अन्य बहुत से महत्त्वपूर्ण पुरस्कार प्रदान किए गए। 1999 में, उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।

पंडित रविशंकर एक महान संगीतकार थे परंतु वह आजीवन विनम्र इन्सान बने रहे। राग माला शीर्षक से अपनी आत्मकथा में, उन्होंने कहा : ‘‘लोग अकसर मुझसे पूछते हैं कि आप क्या चाहते हैं कि लोग आपको किस काम के लिए याद करें; और मैं चाहूंगा कि मुझे मेरी गलतियों के लिए नहीं बल्कि उन उपलब्धियों के लिए याद किया जाए, जिन्हें मैं प्राप्त कर सका—जिन्होंने मेरे अपने देश और दुनिया भर के लोगों के दिलों को छू लिया। ईश्वर की मुझ पर कृपा रही और मैं वास्तव में बहुत भाग्यशाली रहा हूं कि मुझे समूचे विश्व में ख्याति और प्रशंसा प्राप्त हुई। यह मेरा सौभाग्य रहा है कि हमारे संगीत की महानता के संप्रेषण में कभी कोई बाधा नहीं आई।’’

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