“ट्रॉफी मायने रखती है, उपलब्धियां नहीं”: गौतम गंभीर का बड़ा संदेश
भारतीय मुख्य कोच गौतम गंभीर बार-बार एक ही बात दोहराते हैं—टीम खेल में व्यक्तिगत उपलब्धियों से ज्यादा ट्रॉफी मायने रखती है। गंभीर इस सिद्धांत को हर मौके पर दोहराते हैं, खासकर उन लोगों के लिए जो अब भी क्रिकेट में व्यक्तिगत आंकड़ों को सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं।
रविवार को इसका ताजा उदाहरण देखने को मिला जब भारत ने फाइनल में शानदार प्रदर्शन करते हुए न्यूजीलैंड को 96 रन से हराकर अपना तीसरा टी20 विश्व कप खिताब जीत लिया। इस ऐतिहासिक जीत के बाद भी गंभीर का जोर व्यक्तिगत प्रदर्शन के बजाय टीम की ट्रॉफी पर ही रहा।
आईसीसी के वैश्विक फाइनल में दो बार भारत के लिए शीर्ष स्कोरर रहे गंभीर ने स्पष्ट कहा कि टीम में उनकी और टी20 कप्तान सूर्यकुमार यादव की सोच एक जैसी है।
उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि सूर्या के साथ मेरा सामान्य सा फलसफा हमेशा से यही रहा है कि उपलब्धियां मायने नहीं रखतीं, ट्रॉफी मायने रखती है। भारतीय क्रिकेट में बहुत लंबे समय से हम उपलब्धियों के बारे में बात करते आ रहे हैं। और मुझे उम्मीद है कि जब तक मैं हूं, हम उपलब्धियों के बारे में बात नहीं करेंगे।”

भाजपा के पूर्व सांसद रहे गंभीर ने क्रिकेट मीडिया से भी अपील की कि वह खिलाड़ियों की व्यक्तिगत उपलब्धियों के बजाय टीम की ट्रॉफी का जश्न मनाए।
उन्होंने कहा, “उपलब्धियों का जश्न मनाना बंद करो, ट्रॉफी का जश्न मनाओ। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि टीम खेल का बड़ा उद्देश्य ट्रॉफी जीतना है, ना कि व्यक्तिगत रन बनाना। यह मेरे लिए कभी मायने नहीं रखता था और ना ही कभी रखेगा।”
गंभीर ने यह भी कहा कि इस सोच को लेकर उनकी और कप्तान सूर्यकुमार यादव की राय पूरी तरह मिलती है। “मैं बहुत खुशकिस्मत रहा हूं कि सूर्या और मेरी राय एक ही है, विशेषकर इस मामले में।” हालांकि उन्होंने किसी खिलाड़ी का नाम नहीं लिया, लेकिन क्रिकेट जगत में यह समझना मुश्किल नहीं है कि उनका इशारा किन ‘उपलब्धियां हासिल करने वालों’ की तरफ हो सकता है।
दरअसल भारतीय क्रिकेट में यह एक खुला राज रहा है कि गंभीर को हमेशा लगता रहा है कि 2011 विश्व कप फाइनल में उनकी 97 रन की अहम पारी या 2007 टी20 विश्व कप फाइनल में उनकी 75 रन की पारी को वह पहचान नहीं मिली जिसकी वह हकदार थीं।
इन दोनों मैचों में महेंद्र सिंह धोनी का मैच जिताने वाला छक्का (2011) और 2007 फाइनल में जोगिंदर शर्मा को आखिरी ओवर देने का उनका फैसला भारतीय क्रिकेट की लोककथाओं का हिस्सा बन गया।
गंभीर ने मौजूदा टीम के उदाहरण देते हुए बताया कि टीम खेल की असली भावना क्या होती है। उन्होंने वेस्टइंडीज के खिलाफ लगभग क्वार्टर फाइनल जैसे सुपर आठ मुकाबले, सेमीफाइनल और फाइनल में संजू सैमसन की पारियों का जिक्र किया।
उन्होंने कहा, “आप पिछले तीन मैच में देख सकते हैं कि संजू ने क्या किया—नाबाद 97, 89 और 88 (89)। सोचिए अगर आप किसी उपलब्धि के लिए खेल रहे होते तो शायद हम 250 रन तक नहीं पहुंच पाते। इसलिए मुझे लगता है कि यह आप लोगों के लिए भी एक संदेश है।”
गंभीर की सोच पर बहस हो सकती है, लेकिन यह भी सच है कि पिछले दो वर्षों में टीम की जीत के लिए उनकी तारीफ अपेक्षाकृत कम हुई, जबकि हार के बाद आलोचना का बड़ा हिस्सा अक्सर उनके हिस्से आया। सोशल मीडिया पर लगातार आलोचनाओं ने भी उनकी राह आसान नहीं बनाई, लेकिन गंभीर कहते हैं कि उन्हें बाहर से आने वाली राय की परवाह नहीं है।
उन्होंने साफ कहा, “मेरी जवाबदेही किसी सोशल मीडिया के प्रति नहीं है। मेरी जवाबदेही उन 30 लोगों के प्रति है जो ड्रेसिंग रूम में बैठे हैं।” गंभीर ने आगे कहा कि भले ही वह कोच के रूप में दो आईसीसी ट्रॉफी जीत चुके हों, लेकिन उनके लिए सबसे ज्यादा मायने टीम के वे खिलाड़ी रखते हैं जिनके साथ वह काम करते हैं।
उन्होंने कहा, “भले ही मैं एक कोच के तौर पर दो आईसीसी ट्रॉफी जीत चुका हूं, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। भविष्य में भी मेरे कोचिंग कार्यकाल में वे 30 लोग मेरे लिए सबसे ज्यादा मायने रखेंगे, कोई और नहीं।”



