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‘हमने ही वोट दिया, हमारा ही घर तोड़ दिया’, काठमांडू में 11 साल की बच्ची की चिट्ठी ने बुलडोजर कार्रवाई पर उठाए सवाल

नेपाल। काठमांडू में अवैध बस्तियों पर चलाए जा रहे बुलडोजर अभियान के बीच एक 11 साल की बच्ची की भावुक चिट्ठी ने पूरे देश में बहस छेड़ दी है। तीसरी कक्षा में पढ़ने वाली राधिका महतो ने प्रधानमंत्री बालेन शाह को पत्र लिखकर…

Ragwendra P Singh
May 14, 2026
3 min read
‘हमने ही वोट दिया, हमारा ही घर तोड़ दिया’, काठमांडू में 11 साल की बच्ची की चिट्ठी ने बुलडोजर कार्रवाई पर उठाए सवाल

नेपाल। काठमांडू में अवैध बस्तियों पर चलाए जा रहे बुलडोजर अभियान के बीच एक 11 साल की बच्ची की भावुक चिट्ठी ने पूरे देश में बहस छेड़ दी है। तीसरी कक्षा में पढ़ने वाली राधिका महतो ने प्रधानमंत्री बालेन शाह को पत्र लिखकर सवाल किया है कि जब उसके परिवार ने चुनाव में समर्थन दिया था, तो उनका घर क्यों तोड़ दिया गया।

 

“हमने वोट दिया, आपने घर तोड़ दिया”

राधिका महतो ने अपनी चिट्ठी में लिखा कि उनके परिवार ने 5 मार्च के चुनाव में ‘घंटी’ चुनाव चिन्ह को वोट दिया था, लेकिन इसके बावजूद उनका घर प्रशासन ने तोड़ दिया। उसने लिखा, “अब हम कहां रहेंगे और पढ़ाई कैसे करेंगे?”

 

बच्ची ने आगे लिखा कि उनके पास अब किराए का घर लेने तक के पैसे नहीं हैं और सरकार ने उनकी स्थिति और खराब कर दी है।

 

झुग्गी बस्ती पर चला बुलडोजर, हजारों लोग बेघर

करीब तीन हफ्ते पहले काठमांडू के थापाथली इलाके में स्थित गुहेश्वरी बाल शिक्षा सेकेंडरी स्कूल के पास बनी झुग्गी बस्तियों को प्रशासन ने हटाया था। कार्रवाई के दौरान सैकड़ों अस्थायी झोपड़ियों को ध्वस्त कर दिया गया, जिसके बाद हजारों लोग बेघर हो गए।

 

विस्थापित परिवारों को काठमांडू से करीब 75 किलोमीटर दूर बनेपा नगरपालिका के अस्थायी शिविरों में भेजा गया है।

 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले दो हफ्तों में करीब 15,000 से अधिक भूमिहीन लोगों को हटाया गया है और लगभग 4,000 अस्थायी ढांचों को तोड़ा गया है।

 

“हमें स्कूल और घर चाहिए” – बच्ची की गुहार

राधिका ने अपनी चिट्ठी में प्रधानमंत्री से अपील करते हुए लिखा कि उसे पढ़ाई जारी रखने के लिए स्कूल और रहने के लिए सुरक्षित जगह दी जाए। घर टूटने के बाद उसकी शिक्षा भी बाधित हो गई है।

 

सरकार पर गंभीर आरोप, सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला

इस कार्रवाई को लेकर मानवाधिकार संगठनों और विपक्षी दलों ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि बिना पुनर्वास योजना के गरीब परिवारों को बेघर किया जा रहा है।

 

मामला अब Supreme Court of Nepal तक पहुंच चुका है। अदालत ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए कहा है कि बिना उचित पुनर्वास के किसी भी झुग्गी बस्ती को न हटाया जाए।

 

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि विस्थापन की प्रक्रिया कानून के अनुसार होनी चाहिए और इसमें लोगों के आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे अधिकारों की रक्षा जरूरी है।

 

बुलडोजर अभियान पर बढ़ता विरोध

सरकार ने इस अभियान का बचाव करते हुए कहा है कि यह कार्रवाई सरकारी जमीन को खाली कराने और शहर के विकास के लिए जरूरी है। वहीं दूसरी ओर, इस कार्रवाई के खिलाफ नाराजगी अब काठमांडू से बाहर भी फैलने लगी है।

 

पोखरा में सैकड़ों लोगों ने प्रदर्शन करते हुए प्रधानमंत्री बालेन शाह के इस्तीफे की मांग की है। यह मामला अब सिर्फ एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय संकट के रूप में सामने आ रहा है, जिस पर देशभर में तीखी बहस जारी है।

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