यूपी एमएलसी चुनावः संगठन की निष्क्रियता ने आलाकमान को दिखाया आईना
पार्टी की ताकत परिषद में बढ़ी है, लेकिन आंकड़ों के इस खेल से इतर सबसे ज्यादा चर्चा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र काशी यानी वाराणसी की स्नातक विधान परिषद सीट पर भाजपा को मिली करारी शिकस्त की हो रही है। वीवीआईपी क्षेत्र में सत्ताधारी दल की यह हार केवल एक सीट का नुकसान नहीं है, बल्कि इसने पार्टी के भीतर सरकार और संगठन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

संजय सक्सेना,लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधान परिषद की 11 सीटों पर हुए हालिया चुनाव के नतीजों ने राज्य की सियासत में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। चुनाव परिणाम सामने आने के बाद भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी, दोनों ही खेमों में अपनी-अपनी जीत के दावे किए जा रहे हैं और खुशियां मनाई जा रही हैं। भारतीय जनता पार्टी के पास पहले भी इन 11 में से छह सीटें थीं और इस बार भी वह छह सीटें अपनी झोली में डालने में सफल रही है, जिससे वह तकनीकी तौर पर अपनी स्थिति बरकरार रखने का दावा कर रही है। दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी के लिए यह चुनाव एक बड़ी मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक बढ़त लेकर आया है, क्योंकि उसकी सीटों की संख्या में दो सीटों का इजाफा हो गया है। पार्टी की ताकत परिषद में बढ़ी है, लेकिन आंकड़ों के इस खेल से इतर सबसे ज्यादा चर्चा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र काशी यानी वाराणसी की स्नातक विधान परिषद सीट पर भाजपा को मिली करारी शिकस्त की हो रही है। वीवीआईपी क्षेत्र में सत्ताधारी दल की यह हार केवल एक सीट का नुकसान नहीं है, बल्कि इसने पार्टी के भीतर सरकार और संगठन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस चुनावी सफलता से उत्साहित होकर समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने अयोध्या और मथुरा के बाद अब काशी में भी भाजपा की हार और सपा की जीत को एक बड़ा सियासी संदेश बताया है। उन्होंने इसे प्रभु का विशेष आशीर्वाद करार देते हुए कहा है कि जनता अब बदलाव का मन बना चुकी है और धार्मिक व सांस्कृतिक महत्व वाले इन प्रमुख केंद्रों पर विपक्ष की जीत इस बात का सीधा प्रमाण है। हालांकि, दावों और जश्न के इस दौर के बीच छिपी हकीकत बेहद कड़वी है। जमीनी हकीकत यही बयां करती है कि भारतीय जनता पार्टी को इस विधान परिषद चुनाव में भारी फजीहत का सामना करना पड़ा है। इस शिकस्त के पीछे राज्य सरकार और दलीय संगठन, दोनों की ही घोर लापरवाही और तालमेल की कमी खुलकर सामने आई है। राजनीति के गलियारों में यह चर्चा आम हो गई है कि उत्तर प्रदेश में सरकार अब संगठन से बड़ी हो चुकी है, जिसके कारण कार्यकर्ताओं की आवाज और जमीनी इनपुट की अनदेखी की जा रही है। वहीं दूसरी ओर, संगठन का नेतृत्व ऐसे चेहरों के हाथों में चला गया है, जो खुद जमीनी मेहनत करने के बजाय सिर्फ नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ के करिश्माई चमत्कार के सहारे सब कुछ हासिल कर लेने का मुगालता पाले बैठे रहते हैं।
उधर, सपा की इस अप्रत्याशित सफलता के पीछे पार्टी आलाकमान की एक बेहद सूक्ष्म और त्रिस्तरीय दीर्घकालिक रणनीति सक्रिय थी, जिसने सत्तापक्ष को संभलने का मौका ही नहीं दिया। अखिलेश यादव ने चुनाव की घोषणा से काफी पहले ही सिर्फ जिताऊ और स्थानीय समीकरणों में फिट बैठने वाले प्रत्याशियों का चयन कर लिया था, जिन्हें उन्होंने पीडीए के पांडव कहकर संबोधित किया। विपक्ष की इस विशेष रणनीति के तहत केवल बड़े बयानों पर निर्भर रहने के बजाय चुपचाप जमीन पर काम किया गया। सपा ने अपने मौजूदा विधायकों, सांसदों के साथ-साथ पूर्व जनप्रतिनिधियों की एक विशाल टीम को सिर्फ मतदाता बनाने और जिलों में सघन प्रचार के लिए उतार दिया था। जिला संगठनों को सक्रिय कर हर एक बूथ स्तर पर स्नातक और शिक्षक मतदाताओं से सीधा संवाद साधा गया, जिसकी निरंतर समीक्षा खुद अखिलेश यादव कर रहे थे। सपा प्रमुख द्वारा वाराणसी और आगरा जैसे संवेदनशील केंद्रों पर 500-500 समर्पित कार्यकर्ताओं की टोलियां शिफ्ट में तैनात की गई थीं, ताकि वोटों की सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके। इस बेहद सधे हुए और शांत सांगठनिक घेराबंदी की भनक विपक्ष के प्रत्याशियों को आखिरी वक्त तक नहीं लग सकी, जिसके बूते सपा न केवल विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष (की अपनी कुर्सी बचाने में कामयाब रही, बल्कि उसने सत्ताधारी दल के अभेद्य किलों में सेंध भी लगा दी।
परिषद चुनाव में भाजपा आलाकमान की लापरवाही भी कम जिम्मेदार नहीं रही। संगठन के शीर्ष स्तर पर फैसलों में देरी और मंत्रियों को सांगठनिक जिम्मेदारी सौंपने की नीति पार्टी पर भारी पड़ी है। उदाहरण के तौर पर, केंद्रीय मंत्री होने के कारण भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी संगठन के कार्यों के लिए पर्याप्त समय नहीं निकाल पा रहे हैं। एक व्यक्ति के पास दो बड़ी और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां होने की वजह से उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्य में संगठन को जिस सघन समय और ऊर्जा की आवश्यकता थी, वह उसे नहीं मिल सकी। इसका सीधा असर चुनाव की तैयारियों पर पड़ा। जमीनी स्तर पर हालात इतने बदतर हो चुके थे कि बीजेपी के परंपरागत मतदाताओं का नाम तक पार्टी के जिम्मेदार पदाधिकारी और कार्यकर्ता वोटर लिस्ट में शामिल नहीं करा पाए। पूरे प्रदेश में ऐसे तमाम स्नातक और शिक्षक मतदाता मौजूद थे, जो भारतीय जनता पार्टी के वैचारिक समर्थक थे और चुनाव में वोट देना चाहते थे, लेकिन प्रशासनिक शिथिलता और पार्टी की सुस्ती के कारण चाहकर भी उनका नाम मतदाता सूची में दर्ज नहीं हो सका। इनमें से बड़ी संख्या में ऐसे मतदाता थे, जिन्होंने वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के लिए अपने भरे हुए फॉर्म काफी समय पहले ही बीजेपी के स्थानीय कार्यकर्ताओं और प्रभारियों को सौंप दिए थे, मगर संगठन के सुस्त तंत्र ने उन फॉर्मों को समय पर आगे नहीं बढ़ाया।
वोटर लिस्ट के प्रबंधन में बरती गई इसी घोर लापरवाही का नतीजा था कि भाजपा को अपनी मजबूत पकड़ वाली लखनऊ स्नातक सीट पर भी हार का मुंह देखना पड़ गया। राजधानी में पार्टी के गढ़ में इस तरह की हार संगठन की आंखें खोलने वाली है। अगर समग्र रूप से इन 11 सीटों के चुनावी नतीजों का गहरा विश्लेषण किया जाए, तो यह साफ हो जाता है कि मध्यवर्गीय, शिक्षक और शिक्षित युवा वर्ग, जो लंबे समय से भाजपा का मजबूत वोट बैंक माना जाता रहा है, उसके भीतर कहीं न कहीं व्यवस्था को लेकर असंतोष और नाराजगी पनप रही है। इसके विपरीत, भाजपा का चुनावी तंत्र अति-आत्मविश्वास का शिकार रहा। कार्यकर्ताओं में वह पुराना जोश और सक्रियता गायब दिखी, जो कभी पन्ना प्रमुख स्तर तक दिखाई देती थी। जब संगठन का कार्यकर्ता निष्क्रिय हो जाता है और मतदाता से सीधा संपर्क टूट जाता है, तो सत्ता का संरक्षण भी चुनाव जिताने में नाकाफी साबित होता है। इस चुनाव ने भाजपा को स्पष्ट संदेश दिया है कि केवल बड़े नेताओं के दौरों और रैलियों के भरोसे स्थानीय और निकाय स्तर के चुनावों को नहीं जीता जा सकता। यदि वोटर लिस्ट तैयार करने जैसे बुनियादी संगठनात्मक कार्यों में इतनी बड़ी कोताही बरती जाएगी, तो आने वाले बड़े चुनावों में इसके और भी गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। काशी और लखनऊ जैसे शहरों में मिली हार भाजपा के लिए आत्मनिरीक्षण का एक बड़ा अवसर है, जहां उसे सरकार और संगठन के बीच के संतुलन को फिर से कायम करना होगा। साथ ही, संगठन को ऐसे समर्पित चेहरों को सौंपना होगा, जो मंत्रियों के प्रोटोकॉल से दूर रहकर चौबीसों घंटे कार्यकर्ताओं के बीच उपलब्ध रहें और जमीनी स्तर पर पार्टी की नींव को मजबूत कर सकें, अन्यथा विपक्ष इसी तरह एक-एक कर उसके अभेद्य किलों में सेंध लगाता रहेगा।
सम्बंधित ख़बरें
बैलेट पर भी पिटी कांग्रेस, आखिर कब तक बहानों की राजनीति?
भाजपा भी चुनाव हारती है तो उसे जवाबदेही से छूट नहीं मिल सकती। लेकिन कांग्रेस के नेताओं को यह समझना होगा कि दूसरे की हार गिनाने से अपनी हार का हिसाब खत्म नहीं होता। वाराणसी में भाजपा की पराजय कांग्रेस की जीत नहीं है और नागपुर का परिणाम कर्नाटक की चारों सीटों पर मिली हार का जवाब नहीं बन सकता। राजनीति में प्रतिवाद करना आसान है, अपने संगठन की नाकामी स्वीकार करना कठिन।
त्रिकोणीय चक्रव्यूह में फंसता यूपी का मुस्लिम वोटर
इस द्विपक्षीय खींचतान के बीच सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं एआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी, जिन्होंने अखिलेश यादव की नाक में दम कर रखा है। ओवैसी ने सपा के इस परंपरागत वोट बैंक को झकझोरने के लिए बेहद आक्रामक और भावनात्मक रणनीति अपनाई है।
भारत ने गाजा में तत्काल युद्ध विराम वाले प्रस्ताव पर मतदान से किया परहेज
न्यूयॉर्क ( शाश्वत तिवारी)। भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (यूएनजीए) के उस प्रस्ताव पर मतदान से खुद को अलग रखा है, जिसमें गाजा में ‘तत्काल, बिना शर्त और स्थायी’ युद्ध विराम की मांग की गई थी। स्पेन द्वारा पेश किए गए इस…
अखिलेश के रूख से पार्टी की हिन्दू लॉबी एवं पिछड़े मुसलमानों में नाराजगी
संजय सक्सेना मोदी सरकार ने वक्फ बोर्ड संशोधन बिल को कानून बनाकर एक नया इतिहास लिख दिया है।इन संशोधनों को ‘उम्मीद’ का नाम दिया गया है,लेकिन इंडिया गठबंधन में शामिल तमाम राजनैतिक दलों के साथ-साथ समाजवादी पार्टी ने भी…
