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Congress Party: महाराष्ट्र और हरियाणा में हार के बाद दिल्ली में कांग्रेस की राह क्यों मुश्किल?

बीएस राय: हरियाणा और महाराष्ट्र में हार के बाद दिल्ली में कांग्रेस की स्थिति और कमजोर हो सकती है। आम आदमी पार्टी और बीजेपी ने अभी से चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं, वहीं कांग्रेस संगठन को दुरुस्त करने में जुटी है। बिना मजबूत चेहरे और घटते जनाधार के चलते कांग्रेस को नई रणनीति की जरूरत है।

कांग्रेस पार्टी: हरियाणा और महाराष्ट्र में कांग्रेस की करारी हार ने पार्टी को झकझोर कर रख दिया है। जहां एक ओर लोकसभा चुनाव 2024 में शानदार प्रदर्शन के बाद कांग्रेस के फिर से खड़े होने की चर्चा थी, वहीं इन दो अहम राज्यों में हार ने पार्टी के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इन हार का असर दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 पर भी पड़ेगा?

दिल्ली में अगले तीन महीने में विधानसभा चुनाव होने हैं और आम आदमी पार्टी (आप) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने चुनाव प्रचार अभियान शुरू कर दिया है। वहीं, कांग्रेस अभी भी अपने संगठनात्मक ढांचे को दुरुस्त करने में लगी हुई है।

कांग्रेस को हरियाणा और महाराष्ट्र दोनों में बढ़त मिलने की उम्मीद थी, लेकिन पार्टी को न सिर्फ हार का सामना करना पड़ा, बल्कि महाराष्ट्र में विपक्ष के नेता की कुर्सी भी गंवानी पड़ी। 2024 के लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में सबसे बड़ी पार्टी बनने वाली कांग्रेस विधानसभा चुनाव में अप्रत्याशित रूप से कमजोर साबित हुई। हरियाणा में भी लोकसभा की 50% सीटें जीतने वाली कांग्रेस विधानसभा चुनाव में अपनी ताकत नहीं दिखा पाई।

अभी तक दिल्ली की राजनीति भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच द्विध्रुवीय रही है। कांग्रेस के लगातार कमजोर प्रदर्शन को आप भुनाने की तैयारी में है। आम आदमी पार्टी जनता को यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि बीजेपी को हराने के लिए अरविंद केजरीवाल ही एकमात्र विकल्प हैं। अगर यह नैरेटिव सफल होता है तो चुनाव त्रिकोणीय न होकर दो पार्टियों तक सीमित हो जाएगा, जिससे कांग्रेस को बड़ा नुकसान होगा।

हरियाणा और महाराष्ट्र की तरह दिल्ली में भी कांग्रेस बिना किसी स्पष्ट चेहरे के चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। इसके उलट आम आदमी पार्टी का स्पष्ट सीएम चेहरा अरविंद केजरीवाल हैं और बीजेपी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे के साथ चुनावी मैदान में उतरने की रणनीति बना रही है।

दिल्ली में मुस्लिम आबादी करीब 12 फीसदी है। आमतौर पर बीजेपी को हराने की स्थिति में मुस्लिम वोट एकतरफा उस पार्टी को जाता है जो बीजेपी का मजबूत विकल्प नजर आती है। अगर दिल्ली में यह धारणा बन गई कि आप बीजेपी को हराने में सक्षम है तो कांग्रेस को अल्पसंख्यक वोटों का नुकसान उठाना पड़ सकता है।

दिल्ली कांग्रेस के भीतर उथल-पुथल का दौर चल रहा है। हाल के महीनों में वीर सिंह धींगान, सुमेश शौकीन और मतीन अहमद जैसे कई वरिष्ठ नेता पार्टी छोड़ चुके हैं। यह संकट पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को कमजोर कर रहा है, जिससे चुनाव की तैयारियां प्रभावित हो रही हैं।

दिल्ली में कांग्रेस का जनाधार लगातार घट रहा है। 2013 से पार्टी की स्थिति कमजोर होती जा रही है। 2020 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिली और उसका वोट प्रतिशत घटकर 4.26% रह गया।

आम आदमी पार्टी ने अपने कमजोर क्षेत्रों को मजबूत करने के लिए 11 उम्मीदवारों की सूची जारी की है। इनमें से 6 उम्मीदवार दूसरे दलों से आए हैं। वहीं, भाजपा ने दिल्ली चुनाव के लिए एक बड़ी प्रबंधन टीम बनाई है, जो प्रचार और रणनीति का नेतृत्व करेगी।

दिल्ली में कांग्रेस का नेतृत्व फिलहाल देवेंद्र यादव के हाथों में है, लेकिन उनकी अपील पूरी दिल्ली में सीमित है। शीला दीक्षित के बाद पार्टी के पास कोई मजबूत चेहरा नहीं है। जय प्रकाश अग्रवाल और सुभाष चोपड़ा जैसे वरिष्ठ नेता अब सक्रिय भूमिका में नहीं हैं। क्या दिल्ली में कांग्रेस अपनी पकड़ बनाए रख पाएगी?

हरियाणा और महाराष्ट्र में मिली हार ने दिल्ली में कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। मजबूत नेतृत्व और स्पष्ट रणनीति के बिना कांग्रेस के लिए दिल्ली चुनाव जीतना बेहद चुनौतीपूर्ण होगा। आम आदमी पार्टी और बीजेपी के आक्रामक चुनाव प्रचार के बीच कांग्रेस को अपना खोया हुआ जनाधार वापस पाने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी।

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