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चुनाव आयोग ने आगामी पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों को लेकर चुनावी खर्च की सीमा में 15% की बढ़ोतरी की।

इंडियन व्यू टीम/ नई दिल्ली: देश में बढ़ती महंगाई और चुनाव प्रचार के बदलते आधुनिक तरीकों को ध्यान में रखते हुए भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) ने एक बड़ा नीतिगत फैसला लिया है। चुनाव आयोग ने एक आधिकारिक अधिसूचना जारी कर आगामी पांच राज्यों (जिनमें बड़े राज्य भी शामिल हैं) के विधानसभा चुनावों के लिए उम्मीदवारों के चुनावी खर्च की अधिकतम सीमा (Expenditure Limit) में 15 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी कर दी है। इस फैसले से उन हजारों उम्मीदवारों को बड़ी राहत मिलेगी जो चुनाव प्रचार के दौरान खर्च की सीमा पार हो जाने के डर से कानूनी पचड़ों में फंसे रहते थे।

खर्च की नई सीमा क्या होगी?

चुनाव आयोग के नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, बड़े राज्यों (जैसे महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल आदि) में विधानसभा चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार अब अपने प्रचार-प्रसार पर 40 लाख रुपये की जगह 46 लाख रुपये तक खर्च कर सकेंगे। वहीं, छोटे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (जैसे गोवा, सिक्किम आदि) के लिए यह सीमा 28 लाख रुपये से बढ़ाकर लगभग 32.2 लाख रुपये कर दी गई है। लोकसभा चुनावों के लिए भी यह सीमा आनुपातिक रूप से बढ़ाई गई है, जो बड़े राज्यों में अब 95 लाख रुपये से ऊपर जा चुकी है।

बढ़ोतरी के पीछे का मुख्य कारण

चुनाव आयोग द्वारा गठित की गई एक विशेष व्यय समिति (Expenditure Committee) ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया था कि पिछले कुछ वर्षों में ‘कॉस्ट इन्फ्लेशन इंडेक्स’ (CII) यानी महंगाई दर में तेजी से वृद्धि हुई है। चुनाव प्रचार में इस्तेमाल होने वाली सामग्री, टेंट, लाउडस्पीकर, गाड़ियों के ईंधन (पेट्रोल-डीजल) की कीमतों में काफी इजाफा हुआ है।

इसके अलावा, कोविड-19 महामारी के बाद से चुनाव प्रचार का तरीका पूरी तरह से बदल गया है। राजनीतिक दल अब डिजिटल और वर्चुअल रैलियों (Virtual Rallies), सोशल मीडिया विज्ञापनों और हाई-टेक प्रचार वाहनों पर भारी खर्च करते हैं। पुरानी खर्च सीमा इन नई जरूरतों को पूरा करने के लिए व्यावहारिक नहीं रह गई थी।

काले धन पर लगेगी रोक?

इंडियन व्यू टीम के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव आयोग के इस कदम का एक बड़ा मकसद चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता (Transparency) लाना भी है। खर्च सीमा कम होने के कारण कई उम्मीदवार मजबूरी में ‘काले धन’ (Black Money) का सहारा लेते थे और चुनाव आयोग को गलत ऑडिट रिपोर्ट सौंपते थे। सीमा बढ़ने से उम्मीदवार अब अपना वास्तविक खर्च बैंक खातों (सफेद धन) के जरिए दिखा सकेंगे, जिससे चुनाव आयोग को भी खातों की निगरानी करने में आसानी होगी। हालांकि, कुछ सामाजिक संगठनों ने चिंता जताई है कि खर्च सीमा बढ़ने से गरीब और स्वतंत्र उम्मीदवारों (Independents) के लिए बड़े राजनीतिक दलों का मुकाबला करना और अधिक कठिन हो जाएगा।

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