मीठी क्रांति (स्वीट रिवोल्यूशन) की राह पर चलता भारत

लखनऊ राघवेन्द्र प्रताप सिंह: भारत में शहद उत्पादन को एक महत्वपूर्ण उद्यम के रूप में लंबे समय से देखा जा रहा है लेकिन शहद उत्पादन, भंडारण, निर्यात, विपणन को एक संगठित रूप देकर उसे अधिक परिणाममूलक बनाने पर जोर मोदी सरकार में दिया जाना शुरू हुआ है। पिछले कुछ वर्षों में पीएम मोदी के नेतृत्व में, शहद मिशन ग्रामीण भारत में आजीविका का एक प्रमुख स्रोत बन गया है। गौरतलब है कि मधुमक्खियाँ हमारे पारिस्थितिकी तंत्र की रीढ़ हैं। वे न केवल शहद का उत्पादन करती हैं, बल्कि परागण के माध्यम से कृषि को समृद्ध बनाती हैं और पर्यावरण संरक्षण में योगदान देती हैं। वैज्ञानिकों द्वारा पहले ही कहा जा चुका है कि मधुमक्खिया लगभग 75% खाद्य फसलों के परागण में योगदान देती हैं। मधुमक्खियों के बिना, लगभग 30% खाद्य फसलों और 90% जंगली पौधों की प्रजातियों को गंभीर खतरों का सामना करना पड़ेगा। प्रधानमंत्री के ‘मीठी क्रांति’ के आह्वान ने एक नया मार्ग प्रशस्त किया है जहाँ शहद उत्पादन आर्थिक और स्वास्थ्य समृद्धि का स्रोत बन गया है। इस दिशा में केवीआईसी का कार्य आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। केंद्र सरकार ने तय किया है कि वो शहद के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकारों और किसानों के सहयोग से कई कार्यक्रम आयोजित करेगी। मधुमक्खी पालन और उससे संबद्ध गतिविधियों को बढ़ावा देने के माध्यम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘मीठी क्रांति (स्वीट रिवोल्यूशन)’ की परिकल्पना के अनुरूप शहद की निर्यात क्षमता का दोहन करने के लिए केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों और किसानों के सहयोग से देश भर में कार्यक्रमों की एक श्रृंखला आयोजित करने की योजना बनाई है। इसी कड़ी में केंद्रीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय के अंतर्गत खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) ने मुंबई के विले पार्ले स्थित अपने केंद्रीय कार्यालय में मई माह में ‘मीठी क्रांति उत्सव’ के तहत विश्व मधुमक्खी दिवस 2025 मनाया। इस वर्ष के उत्सव का विषय “प्रकृति से प्रेरित मधुमक्खियाँ हम सभी का पोषण करें” था।
वर्तमान काल में भारत का प्राकृतिक शहद निर्यात मुख्य रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका के बाजार पर निर्भर है जो इस निर्यात का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा है। केवीआईसी अध्यक्ष ने शहद मिशन के तहत उल्लेखनीय उपलब्धियों पर भी प्रकाश डाला। आज तक, केवीआईसी ने देश भर में 2,29,409 से अधिक मधुमक्खी बक्सों और मधुमक्खी कालोनियों का वितरण किया है, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 20,000 मीट्रिक टन शहद का उत्पादन हुआ है, जिससे मधुमक्खी पालकों को 325 करोड़ रुपये की आय हुई है। वित्त वर्ष 2024-25 में, केवीआईसी से जुड़े मधुमक्खी पालकों ने 25 करोड़ रुपये मूल्य का शहद निर्यात किया।
शहद उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सरकार की आत्मनिर्भर भारत पहल के एक हिस्से के रूप में सरकार ने राष्ट्रीय मधुमक्खी पालन और शहद मिशन (एनबीएचएम) के लिए तीन साल (2020-21 से 2022-23) की अवधि हेतु 500 करोड़ रुपये के आवंटन को मंजूरी दी है।
भारत ने वर्ष 1996-97 में अपना पहला संगठित निर्यात शुरू किया था और 74,413 मीट्रिक टन (एमटी) प्राकृतिक शहद का निर्यात किया है जिसका मूल्य 2012-22 में 16 करोड़ 37 लाख 30 हजार अमरीकी डालर है और जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका ने 59,262 मीट्रिक टन का एक बड़ा हिस्सा लिया है। संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, नेपाल, मोरक्को, बांग्लादेश और कतर भारतीय शहद के अन्य शीर्ष गंतव्य थे।
वर्ष 2020 में वैश्विक शहद निर्यात 7.36 लाख मीट्रिक टन दर्ज किया गया था तथा भारत शहद उत्पादक और निर्यातक देशों में क्रमशः 8 वें और 9वें स्थान पर था। 2020 में, कुल शहद उत्पादन 16 लाख 20 हजार मीट्रिक टन आंका गया था और जिसमें सभी पराग (नेक्टर) स्रोतों, कृषि उपजों, वन्य पुष्पों और वन्य वृक्षों से निकाला गया शहद शामिल था। देश का पूर्वोत्तर क्षेत्र और महाराष्ट्र भारत में शहद के प्रमुख प्राकृतिक उत्पादक क्षेत्र हैं और देश में उत्पादित किए गए का लगभग 50 प्रतिशत घरेलू स्तर पर खप जाता है जबकि शेष का दुनिया भर में निर्यात किया जाता है।



