कोहली–रोहित के संन्यास के बहाने : टीम इंडिया की संस्कृति पर बड़ा सवाल
भारतीय क्रिकेट में हाल के दिनों में सिर्फ विराट कोहली और रोहित शर्मा के अचानक टेस्ट संन्यास ने ही हलचल नहीं मचाई, बल्कि उससे जुड़े सवालों ने टीम के अंदरूनी वातावरण पर भी उंगली उठाई है।
मनोज तिवारी के ताज़ा बयान को सिर्फ गौतम गंभीर बनाम तिवारी की तनातनी के रूप में पढ़ना आसान है, लेकिन असल मुद्दा इससे कहीं गहरा है—भारतीय क्रिकेट की उस संस्थागत संस्कृति पर सवाल, जहां खिलाड़ियों को फैसले लेने की स्वतंत्रता कितनी मिलती है।
तिवारी का दावा है कि कोहली और रोहित ने “अपनी मर्जी से” संन्यास नहीं लिया, बल्कि “ट्रांजिशन” जैसे बनाए गए नैरेटिव ने उन्हें उस दिशा में धकेला। भले ही उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, इशारे साफ तौर पर टीम मैनेजमेंट की ओर जाते दिखते हैं, जिसमें मुख्य कोच गौतम गंभीर की भूमिका सबसे प्रभावी मानी जाती है।

लेकिन यहां असली एंगल यह नहीं कि गंभीर ने क्या कहा—बल्कि यह कि भारतीय टीम में सीनियर खिलाड़ियों के निर्णयों को प्रभावित करने वाला माहौल आखिर बन कैसे जाता है? तिवारी का तर्क है कि भारत जैसा विशाल टैलेंट पूल रखने वाला देश “ट्रांजिशन” की मजबूरी में कभी नहीं होता।
यानी माहौल बनाया गया, और यह माहौल इतना मजबूत था कि कोहली–रोहित जैसे दिग्गज भी इससे अछूते नहीं रह सके। कोलकाता टेस्ट में हार के बाद गंभीर द्वारा बल्लेबाजों पर सवाल उठाने को तिवारी ने कोचिंग दर्शन की असफलता बताया। उनका कहना है कि कोच का काम उंगली उठाना नहीं, खिलाड़ी का कंधा पकड़कर उसे तैयार करना होता है।
यह टिप्पणी सिर्फ एक मैच की हार पर नहीं, बल्कि टीम के भीतर जिम्मेदारी किस तरह बांटी जाती है—इस पर भी चोट करती है।
दिलचस्प यह भी है कि तिवारी और गंभीर दोनों कभी एक ही फ्रेंचाइजी के लिए खेले; आज दोनों के विचारों में यह टकराव भारतीय क्रिकेट की उस अनकही बहस को उजागर करता है—क्या भारतीय टीम “स्टार खिलाड़ियों की सुरक्षा” और “नई पीढ़ी को मौका” के बीच संतुलन सही से बना पा रही है, या फिर यह संतुलन निर्देशित किया जा रहा है?



