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योगी पर बनी फिल्म को क्यों नहीं मिला दर्शकों का प्यार

लखनऊ/राघवेन्द्र प्रताप सिंह : अजय द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ ए योगी की रिलीज से पहले खूब चर्चा हुई लेकिन कमाई बेहद निराशाजनक रही। कमजोर कहानी, सीमित प्रचार और राजनीतिक रंग ने दर्शकों को दूर रखा। विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे योगी की छवि पर असर सीमित है।

“अजय द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ ए योगी” की रिलीज को लेकर सेंसर बोर्ड की आपत्तियों और बॉम्बे हाईकोर्ट के हस्तक्षेप ने पहले ही इसे चर्चा में ला दिया था, लेकिन जब यह फिल्म आखिरकार 19 सितंबर को भारत भर में लगभग 500 स्क्रीनों और वैश्विक स्तर पर रिलीज हुई तो उम्मीदें पूरी नहीं हो सकीं। फिल्म का बॉक्स ऑफिस पर प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। पहले दिन इसकी कमाई महज 20 लाख रुपये तक सिमट गई, दूसरे दिन भी यह आंकड़ा केवल 30 लाख रुपये तक ही पहुंच सका, तीसरे दिन यानी रविवार को कलेक्शन 30 से 35 लाख रुपये के बीच रहा, यानी पूरे पहले वीकेंड में फिल्म केवल 80 लाख से 1.10 करोड़ रुपये तक ही जुटा सकी। सोमवार 20 सितंबर को यह और नीचे गिरकर 14 लाख रुपये पर सिमट गई। इन आंकड़ों से साफ है कि फिल्म को न तो बड़े शहरों में और न ही छोटे कस्बों में दर्शकों का खास समर्थन मिला।
फिल्म “अजय: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ ए योगी” मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के जीवन पर आधारित है। यह उनके बचपन, शिक्षा, और वन रेंजर के बेटे से गोरखनाथ मठ के प्रमुख बनने तक की यात्रा को दिखाती है। इसमें उनके संघर्ष, तपस्या और समाज व राष्ट्र के प्रति उनके समर्पण को प्रमुखता दी गई है। फिल्म में अनंत विजय जोशी ने अजय का किरदार निभाया है, जबकि परेश रावल महंत अवैद्यनाथ की भूमिका में हैं। कहानी में कॉलेज में अश्लील टिप्पणियों के खिलाफ अजय की विद्रोह से लेकर गोरखपुर में जनसेवा और माफियाओं के खिलाफ उनके संघर्ष तक के महत्वपूर्ण मोड़ दिखाए गए हैं। फिल्म में राम मंदिर आंदोलन, चुनाव और जनता दरबार जैसी घटनाओं को भी शामिल किया गया है, ताकि उनके राजनीतिक जीवन और व्यक्तित्व का व्यापक चित्र पेश किया जा सके।
फिल्म में अनंत विजय जोशी ने अजय सिंह बिष्ट यानी योगी आदित्यनाथ का किरदार निभाया है और परेश रावल महंत अवैद्यनाथ की भूमिका में हैं। दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ एक पत्रकार के रूप में दिखाई देते हैं जबकि राजेश खट्टर माफिया सरगना मुश्ताक अहमद के किरदार में हैं। इसके अलावा अजय मेंगी रघु , मठ के एक भक्त की भूमिका में हैं और पवन मल्होत्रा, गरिमा विक्रांत सिंह, सर्वर आहुजा, अंकुर ठाकुर, विक्रम सिंह, निपुण बंसल, भगवान तिवारी, जावेद खान किंग, मोनि राय और अकाश महामना जैसी सहायक भूमिकाओं में नजर आते हैं। फिल्म के निर्देशक रविंद्र गौतम हैं जिन्होंने पहले महारानी 2 जैसी वेब सीरीज का निर्देशन किया है और निर्माता रितु मेंगी हैं जिन्होंने सम्राट सिनेमा के तहत इस फिल्म का निर्माण किया है। फिल्म के लेखक दिलीप बच्चन झा और प्रियंक दुबे हैं जबकि संगीतकार मीत ब्रदर्स हैं। यह फिल्म शंतनु गुप्ता की किताब “द मॉन्क हू बिकेम चीफ मिनिस्टर” पर आधारित है
फिल्म में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संघर्ष और तपस्या को दर्शाने की कोशिश की गई है लेकिन समीक्षकों और दर्शकों का मानना है कि यह बायोपिक एकतरफा नजर आती है। इसमें विवादास्पद या आलोचनात्मक पहलुओं को जगह नहीं दी गई। कथा का संतुलन बिगड़ गया और दर्शकों का जुड़ाव कम हो गया। लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर राजेश्वर कुमार ने “ द इंडियन व्यू” से कहा कि बायोपिक के तौर पर यह फिल्म असंतुलित दिखती है। दर्शक अब सिर्फ महिमामंडन से संतुष्ट नहीं होते। उन्हें सच्चाई का संतुलित चित्रण चाहिए। अगर फिल्म में वह नहीं मिलता तो नेता की लोकप्रियता भी बॉक्स ऑफिस की सफलता में नहीं बदल पाता। तकनीकी स्तर पर भी फिल्म पर सवाल उठे हैं। कई समीक्षकों ने कहा कि दूसरा भाग लंबा और बोझिल है। भावनात्मक जुड़ाव कम हो जाता है और कई दृश्यों में वास्तविकता का अभाव दिखता है। संवादों में भी वह धार नहीं है जो दर्शकों को सीट से बांध सके। लखनऊ के एक मल्टीप्लेक्स में फिल्म देखने आए आईटी प्रोफेशनल विकास तिवारी ने कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि फिल्म ज्यादा प्रेरक होगी लेकिन इसमें सिनेमाई पकड़ कमजोर थी। कहानी कई बार प्रचार जैसी लगी और मनोरंजन का अभाव था।
फिल्म समीक्षक बताते हैं कि प्रमोशन और रिलीज रणनीति भी कमजोर रही। फिल्म का प्रचार बहुत सीमित था। बड़े पैमाने पर पब्लिसिटी अभियान नहीं चला। राजनीतिक बायोपिक्स के लिए दर्शकों को थिएटर तक खींचना वैसे ही मुश्किल होता है। जब प्रचार कमजोर हो तो असर और घट जाता है। मुंबई की एक फिल्म समीक्षक दुर्गा सक्सेना ने कहा कि फिल्म को अगर सही समय और तरीके से प्रमोट किया जाता तो शायद शुरुआती कलेक्शन बेहतर होता लेकिन यहां प्रचार और रिलीज दोनों ही कमजोर रहे। रिलीज के पहले सेंसर बोर्ड और अदालत का विवाद भी सामने आया। इससे फिल्म को लॉन्च से पहले ही राजनीतिक रंग मिल गया। इससे प्रचार तो हुआ लेकिन उस तरह का नहीं जो बॉक्स ऑफिस पर मददगार हो बल्कि यह प्रचार फिल्म को राजनीतिक प्रोपेगेंडा के रूप में लेबल करने में ज्यादा असरदार साबित हुआ।
अब सवाल यह है कि क्या फिल्म की नाकामी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छवि पर असर डालेगी ! राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि योगी की लोकप्रियता और उनकी राजनीतिक पकड़ इतनी मजबूत है कि एक फिल्म का असफल होना उनकी छवि को बड़े पैमाने पर नुकसान नहीं पहुंचा सकता। लखनऊ के अवध कॉलेज की प्राचार्य बीना राय बताती हैं “योगी का ब्रांड राजनीतिक जमीन पर बना है। एक फिल्म का हिट या फ्लॉप होना उनकी लोकप्रियता को नहीं तोड़ सकता। हां इससे विपक्ष को तंज कसने का मौका जरूर मिल जाता है।” दर्शकों की राय भी यही इशारा करती है। नोएडा के व्यवसायी एच. सी. ढोंडियाल ने कहा कि वह यह देखने आए थे कि कैसे एक साधारण ग्रामीण मुख्यमंत्री बना लेकिन उन्हें लगा कि फिल्म में कई घटनाओं को सतही तौर पर दिखाया गया। उन्होंने कहा कि नेक इरादे और किस्मत दोनों योगी जी के साथ थीं। लेकिन फिल्म ने इस यात्रा को सिनेमाई रूप से प्रभावी नहीं बनाया। गोरखपुर और उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में योगी समर्थक दर्शक फिल्म को अलग दृष्टि से देखते हैं। उनके लिए यह प्रेरणा का स्रोत है लेकिन महानगरों और युवाओं के बीच फिल्म ने उतना असर नहीं छोड़ा जितना प्रचार और चर्चा से उम्मीद की जा रही थी। सोशल मीडिया पर फिल्म को लेकर हल्की प्रतिक्रियाएं और कुछ मीम्स जरूर बने लेकिन यह इतना बड़ा ट्रेंड नहीं बना कि योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक यात्रा या उनके समर्थकों पर असर डाल सके।
कुल मिलाकर “अजय द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ ए योगी” का बॉक्स ऑफिस पर कमजोर प्रदर्शन इस बात का सबूत है कि सिर्फ लोकप्रिय नेता के जीवन पर फिल्म बना देने से सफलता की गारंटी नहीं मिलती दर्शक अब संतुलित और दमदार कहानी चाहते हैं चाहे वह किसी भी शख्सियत पर क्यों न हो। यह असफलता ज्यादा से ज्यादा इस बात का सबूत है कि राजनीतिक बायोपिक्स को सिर्फ प्रचार का जरिया नहीं बल्कि सिनेमा के स्तर पर भी मजबूत होना पड़ेगा तभी वे दर्शकों का प्यार पा सकेंगी।

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