भारत की हरित ऊर्जा में ऐतिहासिक छलांग
गुजरात के कांडला में शुरू हुआ देश का सबसे बड़ा 'ग्रीन हाइड्रोजन' प्लांट

जीवाश्म ईंधन (Fossil Fuels) पर निर्भरता को जड़ से खत्म करने और वैश्विक जलवायु संकट से लड़ने के लिए भारत ने एक अभूतपूर्व कदम उठाया है। गुजरात के कांडला में देश का सबसे विशाल ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ (Green Hydrogen) उत्पादन संयंत्र आधिकारिक रूप से शुरू कर दिया गया है। प्रतिवर्ष 5 लाख टन शुद्ध हरित ऊर्जा का उत्पादन करने वाला यह प्लांट भारी उद्योगों के कार्बन उत्सर्जन को पूरी तरह शून्य (Zero) करने की दिशा में एक बहुत बड़ा ‘गेम चेंजर’ (Game Changer) साबित होगा।
भारत तेजी से स्वच्छ और भविष्य की ऊर्जा (Clean Energy) की ओर कदम बढ़ा रहा है। कोयले और पेट्रोलियम जैसे पारंपरिक ईंधनों के विकल्प के रूप में दुनिया भर में जिस ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, उसके उत्पादन में भारत ने एक बड़ी वैश्विक छलांग लगाई है। गुजरात का कांडला अब केवल एक प्रमुख व्यापारिक बंदरगाह नहीं रहा, बल्कि यह भारत की ‘हरित ऊर्जा क्रांति’ का एक नया और शक्तिशाली केंद्र बन गया है।
कांडला में स्थापित विशाल संयंत्र की क्षमता
इस अति-आधुनिक संयंत्र की स्थापना से भारत दुनिया के उन चुनिंदा विकसित देशों की कतार में सबसे आगे आकर खड़ा हो गया है, जो बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक (Commercial) ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन कर रहे हैं। इस प्लांट की शुरुआती उत्पादन क्षमता प्रतिवर्ष 5 लाख टन निर्धारित की गई है, जो इसे देश का अब तक का सबसे बड़ा संयंत्र बनाती है। सरकार और निजी क्षेत्र की साझेदारी से बने इस प्लांट ने उत्पादन का पहला चरण सफलतापूर्वक शुरू कर दिया है।
आखिर क्या है ग्रीन हाइड्रोजन और यह कैसे बनता है?
आम जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ क्या है और यह इतना खास क्यों है। दरअसल, यह ब्रह्मांड में पाए जाने वाले सबसे प्रचुर तत्व (हाइड्रोजन) का एक ऐसा रूप है, जिसके उत्पादन में पर्यावरण को बिल्कुल भी नुकसान नहीं पहुंचता है।
इसकी वैज्ञानिक प्रक्रिया (इलेक्ट्रोलाइसिस – Electrolysis) में पानी (H2O) से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन को अलग किया जाता है। इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए जिस बिजली का उपयोग किया जाता है, वह कोयले से नहीं बल्कि पूरी तरह से नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) जैसे सौर या पवन ऊर्जा से प्राप्त की जाती है। सबसे बड़ी बात यह है कि जब इस ग्रीन हाइड्रोजन को ईंधन के रूप में जलाया जाता है, तो धुएं के बजाय केवल पानी की भाप निकलती है। यानी कार्बन उत्सर्जन (Carbon Emission) पूरी तरह से ‘शून्य’ (0) होता है।
भारी उद्योगों का होगा कायाकल्प
इस विशाल प्लांट का सबसे बड़ा और सीधा लाभ देश के उन भारी उद्योगों को मिलेगा जो अपनी भट्टियों को गर्म करने के लिए कोयले और गैस पर अत्यधिक निर्भर हैं। इस्पात (Steel), सीमेंट, पेट्रोकेमिकल और उर्वरक (Fertilizer) जैसे भारी उद्योग देश में सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाते हैं। कांडला में उत्पादित होने वाले इस ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग सीधे तौर पर इन उद्योगों को स्वच्छ ऊर्जा देने के लिए किया जाएगा। इससे इन उद्योगों का कार्बन फुटप्रिंट (Carbon Footprint) नगण्य हो जाएगा।
विदेशी मुद्रा की बचत और निर्यात के नए अवसर
यह परियोजना केवल पर्यावरण के लिए ही नहीं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए भी एक ‘संजीवनी’ है। वर्तमान में भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कच्चा तेल आयात (Import) करके पूरा करता है, जिससे हर साल अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा विदेशों में चली जाती है। इस स्वदेशी ग्रीन हाइड्रोजन प्लांट के शुरू होने से तेल आयात के बिल में भारी कमी आएगी। इसके अलावा, कांडला बंदरगाह पर स्थित होने के कारण, भारत भविष्य में यूरोपीय और एशियाई देशों को ग्रीन हाइड्रोजन का निर्यात (Export) भी आसानी से कर सकेगा।
‘नेट जीरो’ (Net Zero) लक्ष्य की ओर ठोस कदम
भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर वादा किया है कि वर्ष 2070 तक देश ‘नेट जीरो’ यानी शून्य कार्बन उत्सर्जन का महत्वाकांक्षी लक्ष्य हासिल कर लेगा। गुजरात के कांडला में इस विशाल ग्रीन हाइड्रोजन प्लांट की शुरुआत उस दिशा में उठाया गया सबसे ठोस और ऐतिहासिक कदम है। यह साबित करता है कि भारत अब जलवायु परिवर्तन की चेतावनियों से डरने के बजाय, अत्याधुनिक नवाचार (Innovation) के जरिए पूरी दुनिया का नेतृत्व कर रहा है।



